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Wednesday, 15 March 2023

प्रधानमन्त्री संग्रहालय - Pradhanmantri Sangrahalaya


प्रधानमन्त्री संग्रहालय, दिल्ली की एक ऐतिहासिक इमारत है, जहाँ भारत के प्रधानमन्त्री और उनके कार्यकारी को दरसया जाता है। क्या इमारत को 23 जनवरी, 2019 में देश के प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी जी ने खोला था। इसके अलावा यहां पर भारत के महान पुरुष, क्रांतिकारी, और शिक्षाकों से जुड़े बहुत से प्रतिष्ठित हैं।

प्रधानमंत्री संग्रहालय का इतिहास लगभाग 100 साल पुराना है। ये इमारत, राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित तीन मूर्ति मार्ग पर है, जहां पहले राष्ट्रपति भवन का साउथ ब्लॉक था. क्या ब्लॉक के भीतर नेहरू संग्रहालय, गांधी स्मृति और तीन मूर्ति भवन का ढांचा बनाया गया था। इसके अलावा, प्रधानमंत्री संग्रहालय के बीच में तीन मूर्ति भवन के संग्रहालय के बीच का रास्ता है।

इस संग्रहालय के अंदर आपको भारत के प्रधान मंत्री और उनके कार्यकाल के बारे में सभी जानकारी मिलती है। इसके अलावा यहां पर भारत की महान पुरुष और क्रांतिकारियों से जुड़े प्रदर्शन भी हैं। इसके प्रदर्शन, भारत के इतिहास और संस्कृति से जुड़े हैं और यहां पर आपको मुख्य इतिहासिक, सांस्कृतिक और कला के का प्रदर्शन देखने को मिलते हैं।

प्रधानमंत्री संग्रहालय के डिजाइन और आर्किटेक्चर में भी बहुत सारा इनोवेशन और मॉडर्निटी है। यहां पर मुखिया बिल्डिंग का डिजाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत खूबसूरत है। इसके इंटीरियर डिजाइन में भी बहुत सारा इनोवेशन है। इसकी गैलरी, डिजाइन, आर्किटेक्चर और इंफ्रास्ट्रक्चर काफी में मॉडर्न है।

यहां पर आपको एक अलग ही अनुभव मिलता है, जहां आप देश के इतिहास और संस्कृति से जुडी बातों को देख और समझ सकते हैं। प्रधानमंत्री संग्रहालय का एक महत्वपूर्ण फीचर है कि यहां पर केवल अंग्रेजी में नहीं, बाल्की अनेक भाषाओं में भी प्रदर्शनी और जानकारी दिया गया है।

प्रधानमंत्री संग्रहालय के बारे में लिखते हुए, मैं ये कहना चाहता हूं कि यहां पर आपको भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के बारे में बहुत कुछ जाने को मिलता है। यहां पर प्रदर्शीत प्रदर्शनी, भारत की महान पुरुष और क्रांतिकारियों के जीवन से जुड़े हैं, जो एक प्रेरणा की ज्योति बन सकते हैं। इसके अलावा यहां पर डिजाइन, आर्किटेक्चर और इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

इसके अलावा, यहां पर अनेक गतिविधियां और कार्यक्रम भी होते हैं, जैसे लोगों को इतिहास और संस्कृति से जुडी जानकारी दी जाति है। प्रधानमंत्री संग्रहालय के अंदर भारत के इतिहास और संस्कृति से जुड़े हुए सारे शिल्प हैं, जो दर्शकों के लिए बहुत महत्व हैं।

अंत में, प्रधानमंत्री संग्रहालय एक ऐसी जगह है, जहां पर आगंतुक को भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के बारे में जानकारी और प्रेरणा मिलती है। यहां पर आपको एक अलग ही अनुभव मिलता है, जहां आप देश के इतिहास और संस्कृति से जुडी बातों को देख और समझ सकते हैं। प्रधानमन्त्री संग्रहालय एक बहुत ही खूबसूरत, अच्छी तरह से डिज़ाइन किया गया और अच्छी तरह से बनाए रखा इमारत है, जिस तरह आगंतुकों को कई सीखने के अवसर मिलते हैं।

प्रधानमंत्री संग्रहालय एक ऐसी जगह है, जहां पर आगंतुक को भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के बारे में जानकारी और प्रेरणा मिलती है। यहां पर आपको एक अलग ही अनुभव मिलता है, जहां आप देश के इतिहास और संस्कृति से जुडी बातों को देख और समझ सकते हैं। इसके अलावा यहां पर अनेक गतिविधियां और कार्यक्रम भी होते हैं, जैसे लोगों को इतिहास और संस्कृति से जुडी जानकारी दी जाति है।

संग्रहालय के अंदर आपको बहुत से प्रदर्शनी और कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। यहां पर डिस्प्ले किए जाते हैं भारत की महान पुरुषों और क्रांतिकारियों के जीवन से जुड़े सारे सामग्री, जो एक प्रेरणा की ज्योति बन सकते हैं। आप यहां पर देख सकते हैं गांधी जी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और ढेर सारे और महान नेताओं की तस्वीर और सामग्री। आपको यहां पर उनके जीवन से जुडी कहानियां भी सुनने को मिल सकती हैं। यहां पर आपको उनके जीवन से जूडी ढेर सारी बातें, जैसे उनके बचपन से लेकर आखिरी दिनों तक की कहानियां भी सुनने को मिल सकती हैं। इसके अलावा, यहां पर और भी प्रदर्शनी है, जैसे कि भारत के विभिन् राज्यों से जूडी धार्मिक और ऐतिहासिक सामग्री, हस्तशिल्, पेंटिंग, स्कल्पचर, वस्त्र, और धीरे सारे और प्रकार की सामग्री।

इसके अलावा, संग्रहालय के अंदर आपको बहुत से गतिविधियां और इवेंट भी देखने को मिलते हैं। यहां पर रेगुलर टूर होते हैं, जिस तरह विजिटर्स को संग्रहालय के अंदर के एक्जीबिट्स और आर्टिफैक्ट्स के बारे में बताता जाता है। इसके अलावा यहां पर वर्कशॉप, सेमिनार, और धेर सारे और इवेंट भी होते हैं, जिस तरह विजिटर्स को इतिहास और संस्कृति से जुडी जानकारी दी जाती है। आप यहां पर अपने बच्चों को लेकर भी सकते हैं, क्योंकि यहां पर उनके लिए विशेष गतिविधियां और इवेंट भी होते हैं, जैसे कि क्राफ्ट-मेकिंग, स्टोरीटेलिंग, और धीरे सारे और प्रकार के सीखने की गतिविधियां।

संग्रहालय के अंदर का डिजाइन, आर्किटेक्चर और इंफ्रास्ट्रक्चर भी बहुत खूबसूरत और अच्छी तरह से मेंटेन है। यहां पर आपको एक आधुनिक और सुसज्जित संग्रहालय देखने को मिलता है, जहां पर नवीनतम तकनीक का उपयोग किया गया है, जैसे की टचस्क्रीन, इंटरैक्टिव डिस्प्ले, संवर्धित वास्तविकता, और धीरे सारे और प्रकार के डिजिटल टूल्स। ये सभी टेक्नोलॉजी के टूल्स और डिवाइस, विजिटर्स को इंटरएक्टिव और इमर्सिव एक्सपीरियंस प्रदान करते हैं। इसके अलावा, यहां पर एक बहुत बड़ा ऑडिटोरियम भी है, जहां पर नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रम, सेमिनार, और प्रदर्शनियां भी होते हैं।

संग्रहालय के अंदर के प्रदर्शन और प्रौद्योगिकी के उपयोग से, आगंतुकों को एक ज्वलंत और आकर्षक अनुभव मिलता है। यहां पर लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से, विजिटर्स को भारत की इतिहास और संस्कृति से जुडी बातें विजुअल और ऑडिटरी तारिके से समझ में आती हैं। इसके अलावा, संवर्धित वास्तविकता के उपयोग से, आगंतुकों को एक 3डी अनुभव मिलता है, जिसमें वो पुराने समय और सहयोगों के जीवन को लाइव देख सकते हैं। इसके अलावा, यहां पर टचस्क्रीन और इंटरएक्टिव डिस्प्ले के इस्तेमाल से, विजिटर्स को भारत के ऐतिहासिक धार्मिक स्थल और जगाओं के बारे में भी जानकारी मिल सकती है। ऐसे ही टेक्नोलॉजी के टूल्स के इस्तेमाल से, यहां पर विजिटर्स को इमर्सिव और एंगेजिंग एक्सपीरियंस प्रोवाइड किया जाता है।

संग्रहालय का मिशन, भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देना है। इसके अलावा, यहां पर भारत के इतिहास और संस्कृति से जूडी जागरूकता भी बधाई जाती है। इस्लीये, संग्रहालय का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, कि यहां पर नियमित शोध और संरक्षण कार्य भी किया जाता है, ताकि भारत की सांस्कृतिक और इतिहासिक धरोहर को संरक्षित किया जा सके।

प्रधानमंत्री संग्रहालय एक ऐसी जगह है, जहां पर आगंतुक को एक अलग ही अनुभव मिलता है। यहां पर प्रदर्शनी, प्रौद्योगिकी, कार्यक्रम और संरक्षण कार्य के साथ-साथ, आगंतुकों को भारत के इतिहास और संस्कृति से जुड़ी बातों को समझने और अपने के लिए प्रेरणा मिलती है। इसलिए, अगर आपको भारत की इतिहास और संस्कृति से जुडी जानकारी पाने और उन्हें समझने की इच्छा है, तो प्रधानमंत्री संग्रहालय एक अवश्य जाना चाहिए।

Tuesday, 28 April 2020

भारत का इतिहास :- आधुनिक भारत

उत्तरकालीन मुगल सम्राट्

> उत्तरकालीन मुगल सम्राट् गुरु गोविन्द सिंह ने बहादुरशाह का साथ दिया था।
> बहादुरशाह का पूर्व नाम मुअज्जम था।
> बहादुरशाह को शाह-वे खबर-के उपनाम से पुकारा जाता था।
> जहाँदारशाह अपने शासन में लाल कुमारी नाम की वेश्या को हस्तक्षेप करने का आदेश दे रखा था
> मुगलकालीन इतिहास में सैयद बन्धु हुसैन अली खाँ एवं अब्दुल्ला खाँ को शासक निर्माता के रूप में जाना जाता है।
> जहाँदार शाह को लम्पट मूर्ख भी कहा जाता था।
> फर्रुखसियर को मुगल वंश का घृणित कायर कहा गया है।
> सुन्दर युवतियों के प्रति अत्यधिक रुझान के कारण मुहम्मदशाह को रंगीला बादशाह कहा जाता था।


मुगलों से स्वतंत्र होने वाले राज्य एवं संस्थापक

अवध सआदत खाँ
हैदराबाद चिनकिलिच खाँ या निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह
रोहिलखंड वीर दाऊद एवं अली मुहम्मद खाँ
बंगाल मुर्शिदकुली खाँ
कर्नाटक सादुतुल्ला खाँ
भरतपुर चुरामन एवं बदन सिंह

नोट : मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने सआदत खाँ को बुरहान-उल-मुल्क की उपाधि दी सआदत खाँ को उसकी नाम मीर मुहम्मद अमीन था

> तुरानी सैनिक हैदरवेग ने 9 अक्०, 1720 को सैय्यद बन्धु हुसैन अली खाँ की हत्या कर दी।
> ईरान (फ़ारस) के सम्राट नादिरशाह ने 1739 ई० में दिल्ली पर आक्रमण किया। उस समय दिल्ली का शासक मूहम्मदशाह था नादिरशाह को ईरान का नेपोलियन कहा जाता है
> नादिर शाह लगभग 70 करोड़ रुपए की धनराशि और शाहजहाँ का बनवाया हुआ तख्ते ताऊस (Peacock throne) तथा कोहिनूर हीरा लेकर फ़ारस वापस लौटा ।
> तख्ते ताऊस (मयूर सिंहासन) पर बैठने वाला अंतिम मुगल शासक मुहम्मदशाह था ।
> शाह आलम-II (अली गौहर) के शासन काल में 1803 ई० में अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
> पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 ई० में मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली की सेना के बीच हुआ। इस युद्ध में मराठों की हार हुई थी
> गुलाम कादिर खाँ ने 1806 ई० को शाहआलम-II की हत्या करवा दी ।
> बहादुरशाह-II (जफर) अंतिम मुगल सम्राट् था।
> 1857 ई० की क्रांति में भाग लेने के कारण अंग्रेजों द्वारा बहादुरशाह जफ़र को बंदी बना लिया गया एवं रंगून भेज दिया।
> अहमद शाह अब्दाली का वास्तविक मान अहमद खानँ था इसने 8 बार भारत पर आक्रमण किया

उत्तर कालीन मुगल सम्राट

बहादुर शाह 1707-1712 ईo
जहां दार शाह 1712-1713 ईo
फर्रूखसियर 1713-1700 ईo
मुहम्मद शाह 1719-1748 ईo
अहमद शाह 1748-1754 ईo
आलमगीर-II 1754-1759 ईo
शाह आलम-II 1759-1806 ईo
अकबर-II 1806-1837 ईo
बहादुर शाह जफर 1837-1857 ईo

अन्य ब्लॉग लिंक :-  भारत का इतिहास :- मराठों का उत्कर्ष

भारत का इतिहास :- मराठों का उत्कर्ष


> मराठा साम्राज्य का संस्थापक शिवाजी थे |
> शिवाजी का जन्म 6 अप्रैल, 1627 ई० में शिवने दुर्ग (जुन्नार के समीप) में हुआ था ।
> शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भोंसल एवं माता का नाम जीजाबाई था।
> शाहजी भोंसले की दूसरी पत्नी का नाम तुकाबाई मोहिते था ।
> शिवाजी के गुरु कोंडदेव थे।
> आध्यात्मिक क्षेत्र में शिवाजी के आचरण पर गुरु रामदास का काफी प्रभाव था।
> शिवाजी का विवाह साइबाई निम्बालकर से 1640 ई० में हुआ।
> शाहजी ने शिवाजी को पूना की जागीर प्रदान कर स्वयं बीजापुर रियासत में नौकरी कर ली ।
> अपने सैन्य अभियान के अन्तर्गत 1644 ई० में शिवाजी ने सर्वप्रथम बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार किया ।
> 1656 ई० में शिवाजी ने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।
> बीजापुर के सुल्तान ने अपने योग्य सेनापति अफजल खाँ को सितम्बर, 1665 ई० में शिवाजी को पराज़ित करने के लिए भेजा।
> शिवाजी ने सूरत को 1664 ई० एवं 1679 ई० में लुटा
> पुरन्दर की संधि 1665 ई० में महाराजा जय सिंह एवं शिवाजी के मध्य संपन्न हुई
> 1672 ई० में शिवाजी ने पन्हाला दुर्ग को बीजापुर से छीना
> 5 जून, 1674 ई० को शिवाजी ने रायगढ़ में वाराणसी (काशी) के प्रसिद्ध विद्वान श्री गगाभट्ट द्वारा अपना राज्याभिषेक करवाया। मूल रूप से गंगाभट्ट महाराष्ट्र का एक सम्मानित ब्राह्मण था, जो लंबे समय से वाराणसी में रह रहा था।
> शिवाजी को औरंगजेब ने मई, 1666 ई० में जयपुर भवन में कैद कर लिया, जहाँ से वे 16 अगस्त, 1666 ई० में भाग निकले ।
> मात्र 53 वर्ष की आयु में 3 अप्रैल, 1680 ई० को शिवाजी की मृत्यु हो गयी।

महाराष्ट्र के प्रमुख संत

1.ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर (1271-1296): महाराष्ट्र में भक्ति आदोलन के जनक, मराठी भाषा और साहित्य के संथापक, भगवत्गीता पर भावार्थदीपिका नामक बृहत टीका लिखी,
जिसे सामान्य रूप से ज्ञानेश्वरी के नाम से जाना जाता है।
2. नामदेव (1270-1350) : इनके अराध्य देव पांढरपुर के बिठोबा या विट्ठल (विष्णु के रूप) थे। बिठोबा या विट्ठल की उपासना को वरकरी संप्रदाय के नाम से जाना जाता है, जिसकी स्थापना नामदेव ने की थी ।
3.एकनाथ (1533-1599); इन्होंने रामायण पर भावार्थ रामायण नामक टीका लिखी।
4. तुकाराम (1598-1650): इन्होंने भक्तिपरक कविताएँ लिखी जिन्हें अभंग कहा जाता है । ये अभंग भक्तिपरक काव्य के ज्योतिपुंज है।
5. रामदास (1608-1681): महाराष्ट्र के अंतिम महान संत कवि। दशबोध उनकी रचनाओं और उपदेशों का संकलन है।

> शिवाजी के मंत्रिमंडल को अष्टप्रधान कहा जाता था। अष्टप्रधान में पेशवा का पद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सम्मान का होता था।

अष्टप्रधान में निम्न पद थे-

1. पेशवा (प्रधानमंत्री) : राज्य का प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था की देख-रेख
2. सरी-ए-नौबत (सेनापति): सैन्य प्रधान
3. अमात्य (राजस्व मंत्री): आय-व्यय का लेखा-जोखा
4. वाकयानवीस : सूचना, गुप्तचर एवं संधि-विग्रह के विभागों का अध्यक्ष
5. चिटनिस : राजकीय पत्रों को पढ़कर उसकी भाषा-शैली
6. सुमन्त : विदेश मंत्री
7. पंडित राव : धार्मिक कार्यों के लिए तिथि का निर्धारण
8. न्यायाधीश : न्याययाययाय विभाग का प्रधान

> शिकाजी ने दस्बार में मराठी को भाषा के रूप में प्रयोग किया।

> शिवाजी की सेना तीन महत्त्वपूर्ण भागों में विभक्त थी-
1. पागा सेना : नियमित घुड़्सवार सैनिक।
2. सिलहदार : अस्थायी घुड़सवार सैनिक ।
3. पैदल : पैदल सेना।

> शिवाजी की कस्-व्यवस्था मलिक अम्बर की कर-व्यवस्था पर आधारित थी । शिवाजी ने रस्सी द्वारा माप की व्यवस्था के स्थान पर काठी एवं मानक छड़ी के प्रयोग को आरंभ किया।
> शिवाजी के समय कुल उपज का 33% भाग राजस्व के रूप में वसूला जाता था, जो बढ़ कर 40% हो गया था
> चौथे एवं सरदेशमुखी नामक कर शिवाजी के द्वारा लगाया गया। चौथ--किसी एक क्षत्र को बरवाद न- करने के बदले दी जाने वाली रकम को कहा, गया है। सरदेशमुखी- इसके हक का दावा करके शिवाजी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ देशमुख प्रस्तुत करना चाहत थे।

शिवाजी के किले की सुरक्षा के लिए नियुक्त अधिकारी


हवलदार किले की आंतरिक व्यवस्था की देखरेख
सरेनौबत जिले की सेना का नेतृत्व
सवनीस किले की अर्थव्यवस्था पत्र व्यवहार एवं भंडार की देखरेख

शिवाजी के उत्तराधिकारी

> शिवाजी का उत्तराधिकारी शम्भाजी था । शम्भाजी ने उज्जैन के हिन्दी एवं संस्कृत के त्रेकाण्ड विद्वान कवि कलश को अपना सलाहकार नियुक्त किया।
> मार्च, 1689 ई० को मुगल सेनापति मखर्रव खौं ने संगमेश्वर में छिपे कलश को गिरफ्तार कर लिया और उसकी हत्या कर दी।
> शम्भाजी के बाद 1689 ई० में राजाराम को नए छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक किया गया।
> राजाराम ने अपनी दूसरी राजधानी सतारा को बनाया।
> राजाराम मुगलों से संघर्ष करता हुआ 1700 ई० में मारा गया
> राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी तारावाई अपने 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी II का राज्याभिषेक करवाकर मराठा साम्राज्य की वास्तविक संरक्षिका बन गई।
> 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के बाद शम्भाजी के पूत्र साहू (जो औरंगजेब के कब्जे में था) भोपाल के निकट के मुगल शिविर से वापस महाराष्ट्र आया।
> साहू एवं ताराबाई के बीच 1707 ई० में खेड़ा का युद्ध हुआ, जिसमें साहू विजयी हुआ।
> साहू ने 22 जनवरी, 1708 ई० को सतारा में अपना राज्याभिषेक करवाया ।
> साहू के नेतृत्व में नवीन मराठा साम्राज्यवाद के प्रवर्त्तक पेशवा लोग थे, जो साहू के पैतृक प्रधानमंत्री थे। पेशवा पद पहले पेशवा के साथ ही वंशानुगत हो गया था।
> 1713 ई० में साहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा बनाया इनकी मृत्यु 1720 ई० में हुई। इसके बाद पेशवा बाजीराव प्रथम हुए।
> पेशवा बाजीराव प्रथम ने मुगल साम्राज्य की कमजोर हो रही स्थिति का फायदा उठाने के लिए साहू को उत्साहित करते हुए कहा कि आओ, हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखाएँ तो स्वयं गिर जाएगी, हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेगी। उत्तर में साहू ने कहा-निश्चित रूप से ही आप इसे हिमालय के पार गाड़ देंगे, निःसन्देह आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं।
> पालखेड़ा का युद्ध 7 मार्च, 1728 ई० बाजीराव प्रथम एवं निजामुलमुल्क के बीच हुआ जिसमें निजाम की हार हुई निजाम के साथ मुंशी शिवगाँव की संधि हुई।
> दिल्ली पर आक्रमण करने वाला प्रथम पेशवा बाजीराव प्रथम था, जिसने 29 मार्च, 1737 ई० को दिल्ली पर धावा बोला था। उस समय मुगल बादशाह मुहम्मदशाह दिल्ली छोड़ने के लिए तैयार हो गया था।
> बाजीराव प्रथम मस्तानी नामक महिला से संबंध होने के कारण चर्चित रहा था।
> बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद बालाजी बाजीराव 1740 ई० में पेशवा बना।
> 1750 ई० में संगोला संधि के बाद पेशवा के हाथ में सारे अधिकार सुरक्षित हो गए।
> बालाजी बाजीराव को नाना साहब के नाम से भी जाना जाता था।
> झलकी की संधि हैदराबाद के निजाम एवं बालाजी बाजीराव के मध्य हुई।
> बालाजी बाजीराव के समय में ही पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जन०, 1761) हुआ, जिसमें मराठों की हार हुई। इस हार को नहीं सह पाने के कारण वालाजी की मृत्यु 1761 में हो गयी।
> माधवराव नारायण प्रथम 1761 ई० में पेशवा बना। इसने मराठों की खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया।
> माधवराव ने ईस्ट इंडिया कंपनी की पेशन पर रह रहे मुगल वादशाह शाह आलम-II को पुनः दिल्ली की गद्दी पर बैठाया। मुगल बादशाह अब मराठों का पेंशनभोगी बन गया।
> पेशवा नारायण राव (1772-73) की हत्या उसके चाचा रघुनाथ राव के द्वारा कर दी गई।
> पेशवा माधवराव नारायण-II की अल्पायु के कारण मराठा राज्य की देख रेख बारहभाई सभा नाम की 12 सदस्यों की एक परिषद् करती थी। इस परिषद् के दो महत्त्वपूर्ण सदस्य थे-महादजी सिंधिया एवं नाना फड़नबीस ।
> अंतिम पेशवा राघोवा का पुत्र बाजीराव-II था, जो अंग्रेजों की सहायता से पेशवा बना था। मराठों के पतन में सर्वाधिक योगदान इसी का था। यह सहायक संधि स्वीकार करने वाला प्रथम मराठा सरदार था।
> प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध : 1775-82 ई० तक चला। इसके बाद 1776 ई० में पुरन्दर की संधि हुई। इसके तहत कम्पनी ने रघुनाथ राव के समर्थन को वापस लिया।
> द्वितीय ऑग्ल-मराठा युद्ध : 1803-05 ई० में हुआ। इसमें भोंसले (नागपुर) ने अंग्रेजों को चुनौती दी। इसके फलस्वरूप 7 सितम्बर, 1803 ई० को देवगाँव की संघि हुई।
> तृतीय ऑग्ल-मराठा युद्ध : 1816-18 ई० में हुआ। इस युद्ध के बाद मराठा शक्ति और पेशवा के वशानुगत पद को समाप्त कर दिया गया।
> पेशवा बाजीराव-II ने कोरेगाँव एवं अष्टी के युद्ध में हारने के बाद फरवरी 1818 ई० में मेल्कम के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने पेशवा के पद को समाप्त कर बाजीराव-II को कानपुर के निकट बिठूर में पेंशन पर जीने के लिए भेज दिया, जहाँ 1853 ई० में इसकी मृत्यु हो गयी।

अंग्रेज मराठा संघर्ष के अंतर्गत होने वाली प्रमुख संधियाँ


संधियाँ वर्ष
सूरज की संदीप 1775
पुरंदर की संधि 1776
बड़गांव की संधि 1779
साला बाई की संधि 1782
बसीन की संधि 1802
देवगांव की संधि 1803
सुर्जी अर्जुनगांव की संधि 1803
राजपुर घाट की संधि 1804
नागपुर की संधि 1816
ग्वालियर की संधि 1817
पूना की संधि 1817
मंडसौर की संधि 1818

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