Tuesday, 28 April 2020

भारत का इतिहास :- आधुनिक भारत

उत्तरकालीन मुगल सम्राट्

> उत्तरकालीन मुगल सम्राट् गुरु गोविन्द सिंह ने बहादुरशाह का साथ दिया था।
> बहादुरशाह का पूर्व नाम मुअज्जम था।
> बहादुरशाह को शाह-वे खबर-के उपनाम से पुकारा जाता था।
> जहाँदारशाह अपने शासन में लाल कुमारी नाम की वेश्या को हस्तक्षेप करने का आदेश दे रखा था
> मुगलकालीन इतिहास में सैयद बन्धु हुसैन अली खाँ एवं अब्दुल्ला खाँ को शासक निर्माता के रूप में जाना जाता है।
> जहाँदार शाह को लम्पट मूर्ख भी कहा जाता था।
> फर्रुखसियर को मुगल वंश का घृणित कायर कहा गया है।
> सुन्दर युवतियों के प्रति अत्यधिक रुझान के कारण मुहम्मदशाह को रंगीला बादशाह कहा जाता था।


मुगलों से स्वतंत्र होने वाले राज्य एवं संस्थापक

अवध सआदत खाँ
हैदराबाद चिनकिलिच खाँ या निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह
रोहिलखंड वीर दाऊद एवं अली मुहम्मद खाँ
बंगाल मुर्शिदकुली खाँ
कर्नाटक सादुतुल्ला खाँ
भरतपुर चुरामन एवं बदन सिंह

नोट : मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने सआदत खाँ को बुरहान-उल-मुल्क की उपाधि दी सआदत खाँ को उसकी नाम मीर मुहम्मद अमीन था

> तुरानी सैनिक हैदरवेग ने 9 अक्०, 1720 को सैय्यद बन्धु हुसैन अली खाँ की हत्या कर दी।
> ईरान (फ़ारस) के सम्राट नादिरशाह ने 1739 ई० में दिल्ली पर आक्रमण किया। उस समय दिल्ली का शासक मूहम्मदशाह था नादिरशाह को ईरान का नेपोलियन कहा जाता है
> नादिर शाह लगभग 70 करोड़ रुपए की धनराशि और शाहजहाँ का बनवाया हुआ तख्ते ताऊस (Peacock throne) तथा कोहिनूर हीरा लेकर फ़ारस वापस लौटा ।
> तख्ते ताऊस (मयूर सिंहासन) पर बैठने वाला अंतिम मुगल शासक मुहम्मदशाह था ।
> शाह आलम-II (अली गौहर) के शासन काल में 1803 ई० में अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
> पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 ई० में मराठा एवं अहमदशाह अब्दाली की सेना के बीच हुआ। इस युद्ध में मराठों की हार हुई थी
> गुलाम कादिर खाँ ने 1806 ई० को शाहआलम-II की हत्या करवा दी ।
> बहादुरशाह-II (जफर) अंतिम मुगल सम्राट् था।
> 1857 ई० की क्रांति में भाग लेने के कारण अंग्रेजों द्वारा बहादुरशाह जफ़र को बंदी बना लिया गया एवं रंगून भेज दिया।
> अहमद शाह अब्दाली का वास्तविक मान अहमद खानँ था इसने 8 बार भारत पर आक्रमण किया

उत्तर कालीन मुगल सम्राट

बहादुर शाह 1707-1712 ईo
जहां दार शाह 1712-1713 ईo
फर्रूखसियर 1713-1700 ईo
मुहम्मद शाह 1719-1748 ईo
अहमद शाह 1748-1754 ईo
आलमगीर-II 1754-1759 ईo
शाह आलम-II 1759-1806 ईo
अकबर-II 1806-1837 ईo
बहादुर शाह जफर 1837-1857 ईo

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भारत का इतिहास :- मराठों का उत्कर्ष


> मराठा साम्राज्य का संस्थापक शिवाजी थे |
> शिवाजी का जन्म 6 अप्रैल, 1627 ई० में शिवने दुर्ग (जुन्नार के समीप) में हुआ था ।
> शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भोंसल एवं माता का नाम जीजाबाई था।
> शाहजी भोंसले की दूसरी पत्नी का नाम तुकाबाई मोहिते था ।
> शिवाजी के गुरु कोंडदेव थे।
> आध्यात्मिक क्षेत्र में शिवाजी के आचरण पर गुरु रामदास का काफी प्रभाव था।
> शिवाजी का विवाह साइबाई निम्बालकर से 1640 ई० में हुआ।
> शाहजी ने शिवाजी को पूना की जागीर प्रदान कर स्वयं बीजापुर रियासत में नौकरी कर ली ।
> अपने सैन्य अभियान के अन्तर्गत 1644 ई० में शिवाजी ने सर्वप्रथम बीजापुर के तोरण नामक पहाड़ी किले पर अधिकार किया ।
> 1656 ई० में शिवाजी ने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।
> बीजापुर के सुल्तान ने अपने योग्य सेनापति अफजल खाँ को सितम्बर, 1665 ई० में शिवाजी को पराज़ित करने के लिए भेजा।
> शिवाजी ने सूरत को 1664 ई० एवं 1679 ई० में लुटा
> पुरन्दर की संधि 1665 ई० में महाराजा जय सिंह एवं शिवाजी के मध्य संपन्न हुई
> 1672 ई० में शिवाजी ने पन्हाला दुर्ग को बीजापुर से छीना
> 5 जून, 1674 ई० को शिवाजी ने रायगढ़ में वाराणसी (काशी) के प्रसिद्ध विद्वान श्री गगाभट्ट द्वारा अपना राज्याभिषेक करवाया। मूल रूप से गंगाभट्ट महाराष्ट्र का एक सम्मानित ब्राह्मण था, जो लंबे समय से वाराणसी में रह रहा था।
> शिवाजी को औरंगजेब ने मई, 1666 ई० में जयपुर भवन में कैद कर लिया, जहाँ से वे 16 अगस्त, 1666 ई० में भाग निकले ।
> मात्र 53 वर्ष की आयु में 3 अप्रैल, 1680 ई० को शिवाजी की मृत्यु हो गयी।

महाराष्ट्र के प्रमुख संत

1.ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर (1271-1296): महाराष्ट्र में भक्ति आदोलन के जनक, मराठी भाषा और साहित्य के संथापक, भगवत्गीता पर भावार्थदीपिका नामक बृहत टीका लिखी,
जिसे सामान्य रूप से ज्ञानेश्वरी के नाम से जाना जाता है।
2. नामदेव (1270-1350) : इनके अराध्य देव पांढरपुर के बिठोबा या विट्ठल (विष्णु के रूप) थे। बिठोबा या विट्ठल की उपासना को वरकरी संप्रदाय के नाम से जाना जाता है, जिसकी स्थापना नामदेव ने की थी ।
3.एकनाथ (1533-1599); इन्होंने रामायण पर भावार्थ रामायण नामक टीका लिखी।
4. तुकाराम (1598-1650): इन्होंने भक्तिपरक कविताएँ लिखी जिन्हें अभंग कहा जाता है । ये अभंग भक्तिपरक काव्य के ज्योतिपुंज है।
5. रामदास (1608-1681): महाराष्ट्र के अंतिम महान संत कवि। दशबोध उनकी रचनाओं और उपदेशों का संकलन है।

> शिवाजी के मंत्रिमंडल को अष्टप्रधान कहा जाता था। अष्टप्रधान में पेशवा का पद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं सम्मान का होता था।

अष्टप्रधान में निम्न पद थे-

1. पेशवा (प्रधानमंत्री) : राज्य का प्रशासन एवं अर्थव्यवस्था की देख-रेख
2. सरी-ए-नौबत (सेनापति): सैन्य प्रधान
3. अमात्य (राजस्व मंत्री): आय-व्यय का लेखा-जोखा
4. वाकयानवीस : सूचना, गुप्तचर एवं संधि-विग्रह के विभागों का अध्यक्ष
5. चिटनिस : राजकीय पत्रों को पढ़कर उसकी भाषा-शैली
6. सुमन्त : विदेश मंत्री
7. पंडित राव : धार्मिक कार्यों के लिए तिथि का निर्धारण
8. न्यायाधीश : न्याययाययाय विभाग का प्रधान

> शिकाजी ने दस्बार में मराठी को भाषा के रूप में प्रयोग किया।

> शिवाजी की सेना तीन महत्त्वपूर्ण भागों में विभक्त थी-
1. पागा सेना : नियमित घुड़्सवार सैनिक।
2. सिलहदार : अस्थायी घुड़सवार सैनिक ।
3. पैदल : पैदल सेना।

> शिवाजी की कस्-व्यवस्था मलिक अम्बर की कर-व्यवस्था पर आधारित थी । शिवाजी ने रस्सी द्वारा माप की व्यवस्था के स्थान पर काठी एवं मानक छड़ी के प्रयोग को आरंभ किया।
> शिवाजी के समय कुल उपज का 33% भाग राजस्व के रूप में वसूला जाता था, जो बढ़ कर 40% हो गया था
> चौथे एवं सरदेशमुखी नामक कर शिवाजी के द्वारा लगाया गया। चौथ--किसी एक क्षत्र को बरवाद न- करने के बदले दी जाने वाली रकम को कहा, गया है। सरदेशमुखी- इसके हक का दावा करके शिवाजी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ देशमुख प्रस्तुत करना चाहत थे।

शिवाजी के किले की सुरक्षा के लिए नियुक्त अधिकारी


हवलदार किले की आंतरिक व्यवस्था की देखरेख
सरेनौबत जिले की सेना का नेतृत्व
सवनीस किले की अर्थव्यवस्था पत्र व्यवहार एवं भंडार की देखरेख

शिवाजी के उत्तराधिकारी

> शिवाजी का उत्तराधिकारी शम्भाजी था । शम्भाजी ने उज्जैन के हिन्दी एवं संस्कृत के त्रेकाण्ड विद्वान कवि कलश को अपना सलाहकार नियुक्त किया।
> मार्च, 1689 ई० को मुगल सेनापति मखर्रव खौं ने संगमेश्वर में छिपे कलश को गिरफ्तार कर लिया और उसकी हत्या कर दी।
> शम्भाजी के बाद 1689 ई० में राजाराम को नए छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक किया गया।
> राजाराम ने अपनी दूसरी राजधानी सतारा को बनाया।
> राजाराम मुगलों से संघर्ष करता हुआ 1700 ई० में मारा गया
> राजाराम की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी तारावाई अपने 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी II का राज्याभिषेक करवाकर मराठा साम्राज्य की वास्तविक संरक्षिका बन गई।
> 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के बाद शम्भाजी के पूत्र साहू (जो औरंगजेब के कब्जे में था) भोपाल के निकट के मुगल शिविर से वापस महाराष्ट्र आया।
> साहू एवं ताराबाई के बीच 1707 ई० में खेड़ा का युद्ध हुआ, जिसमें साहू विजयी हुआ।
> साहू ने 22 जनवरी, 1708 ई० को सतारा में अपना राज्याभिषेक करवाया ।
> साहू के नेतृत्व में नवीन मराठा साम्राज्यवाद के प्रवर्त्तक पेशवा लोग थे, जो साहू के पैतृक प्रधानमंत्री थे। पेशवा पद पहले पेशवा के साथ ही वंशानुगत हो गया था।
> 1713 ई० में साहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा बनाया इनकी मृत्यु 1720 ई० में हुई। इसके बाद पेशवा बाजीराव प्रथम हुए।
> पेशवा बाजीराव प्रथम ने मुगल साम्राज्य की कमजोर हो रही स्थिति का फायदा उठाने के लिए साहू को उत्साहित करते हुए कहा कि आओ, हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखाएँ तो स्वयं गिर जाएगी, हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेगी। उत्तर में साहू ने कहा-निश्चित रूप से ही आप इसे हिमालय के पार गाड़ देंगे, निःसन्देह आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं।
> पालखेड़ा का युद्ध 7 मार्च, 1728 ई० बाजीराव प्रथम एवं निजामुलमुल्क के बीच हुआ जिसमें निजाम की हार हुई निजाम के साथ मुंशी शिवगाँव की संधि हुई।
> दिल्ली पर आक्रमण करने वाला प्रथम पेशवा बाजीराव प्रथम था, जिसने 29 मार्च, 1737 ई० को दिल्ली पर धावा बोला था। उस समय मुगल बादशाह मुहम्मदशाह दिल्ली छोड़ने के लिए तैयार हो गया था।
> बाजीराव प्रथम मस्तानी नामक महिला से संबंध होने के कारण चर्चित रहा था।
> बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद बालाजी बाजीराव 1740 ई० में पेशवा बना।
> 1750 ई० में संगोला संधि के बाद पेशवा के हाथ में सारे अधिकार सुरक्षित हो गए।
> बालाजी बाजीराव को नाना साहब के नाम से भी जाना जाता था।
> झलकी की संधि हैदराबाद के निजाम एवं बालाजी बाजीराव के मध्य हुई।
> बालाजी बाजीराव के समय में ही पानीपत का तृतीय युद्ध (14 जन०, 1761) हुआ, जिसमें मराठों की हार हुई। इस हार को नहीं सह पाने के कारण वालाजी की मृत्यु 1761 में हो गयी।
> माधवराव नारायण प्रथम 1761 ई० में पेशवा बना। इसने मराठों की खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया।
> माधवराव ने ईस्ट इंडिया कंपनी की पेशन पर रह रहे मुगल वादशाह शाह आलम-II को पुनः दिल्ली की गद्दी पर बैठाया। मुगल बादशाह अब मराठों का पेंशनभोगी बन गया।
> पेशवा नारायण राव (1772-73) की हत्या उसके चाचा रघुनाथ राव के द्वारा कर दी गई।
> पेशवा माधवराव नारायण-II की अल्पायु के कारण मराठा राज्य की देख रेख बारहभाई सभा नाम की 12 सदस्यों की एक परिषद् करती थी। इस परिषद् के दो महत्त्वपूर्ण सदस्य थे-महादजी सिंधिया एवं नाना फड़नबीस ।
> अंतिम पेशवा राघोवा का पुत्र बाजीराव-II था, जो अंग्रेजों की सहायता से पेशवा बना था। मराठों के पतन में सर्वाधिक योगदान इसी का था। यह सहायक संधि स्वीकार करने वाला प्रथम मराठा सरदार था।
> प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध : 1775-82 ई० तक चला। इसके बाद 1776 ई० में पुरन्दर की संधि हुई। इसके तहत कम्पनी ने रघुनाथ राव के समर्थन को वापस लिया।
> द्वितीय ऑग्ल-मराठा युद्ध : 1803-05 ई० में हुआ। इसमें भोंसले (नागपुर) ने अंग्रेजों को चुनौती दी। इसके फलस्वरूप 7 सितम्बर, 1803 ई० को देवगाँव की संघि हुई।
> तृतीय ऑग्ल-मराठा युद्ध : 1816-18 ई० में हुआ। इस युद्ध के बाद मराठा शक्ति और पेशवा के वशानुगत पद को समाप्त कर दिया गया।
> पेशवा बाजीराव-II ने कोरेगाँव एवं अष्टी के युद्ध में हारने के बाद फरवरी 1818 ई० में मेल्कम के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने पेशवा के पद को समाप्त कर बाजीराव-II को कानपुर के निकट बिठूर में पेंशन पर जीने के लिए भेज दिया, जहाँ 1853 ई० में इसकी मृत्यु हो गयी।

अंग्रेज मराठा संघर्ष के अंतर्गत होने वाली प्रमुख संधियाँ


संधियाँ वर्ष
सूरज की संदीप 1775
पुरंदर की संधि 1776
बड़गांव की संधि 1779
साला बाई की संधि 1782
बसीन की संधि 1802
देवगांव की संधि 1803
सुर्जी अर्जुनगांव की संधि 1803
राजपुर घाट की संधि 1804
नागपुर की संधि 1816
ग्वालियर की संधि 1817
पूना की संधि 1817
मंडसौर की संधि 1818

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Sunday, 19 April 2020

भारत का इतिहास :- मुगल शासन व्यवस्था

मुगल शासन व्यवस्था

> मंत्रिपरिषद् को विजारत कहा जाता था ।
> बाबर के शासनकाल में वजीर पद काफी महत्त्वपूर्ण था।
> सम्राट् के बाद शासन के कार्यों को संचालित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी वकील था। जिसके कर्त्तव्यों को अकबर ने दीवान, मीरबख्शी, सद्र-उस-सद्र एवं मीर समन में विभाजित कर दिया।
> औरंगजेब के समय में असद खान ने सर्वाधिक 31 वर्षों तक दीवान के पद पर कार्य किया
> मीरबख्शी द्वारा 'सरखत' नाम के पत्र पर हस्ताक्षर के बाद ही सेना को हर महीने वेतन मिल पाता था।
> जय कभी सद्र न्याय विभाग के प्रमुख का कार्य करता था तब उसे काजी कहा जाता था
> लगान ही भूमि (मदद-ए-माश) का निरीक्षण सद्र  करता था
> सम्राट् के घरेलू विभागों का प्रधान मीर समान कहलाता था। में करवाया।


मुगल काल के प्रमुख अधिकारी एवं कार्य

पद कार्य
सूबेदार प्रांतों में शान्ति स्थापित्त करना (प्रांत कार्यकारिणी का प्रधान)
दीवान प्रांतीय राजस्व का प्रधान (सीधे शाही दीवान के प्रति जवाबदेह)
बक्शी प्रांतीय सैन्य प्रधान
फौजदार जिले का प्रधान फौजी अधिकारी
आमिल या अमलगुजार जिले का प्रमुख राजस्व अधिकारी
कोतवाल नगर प्रधान
शिकदार परगने का प्रमुख अधिकारी
आमिल ग्राम के कृषकों से प्रत्यक्ष संबंध बनाना एवं लगान निर्धारित करना

> सूचना एवं गुप्तचर विभाग का प्रधान दरोगा ए डाक चौकी कहलाता था ।
> शरियत के प्रतिकूल कार्य करनेवालों को रोकना, आम जनता के दुश्चरित्रता से बचाने का कार्य मुहतसिव नामक अधिकारी करता था।
> प्रशासन की दृष्टि से मुगल साम्राज्य का बैटवारा सूबों में, सूबों का सरकार में, सरकार का परगना या महाल में, महाल का जिला या दस्तूर में और दस्तूर ग्राम में बैटे थे।
> प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसे मावदा या दीह कहते थे । मावदा के अन्तर्गत छोटी-छो टीवस्तियों को नागला कहा जाता था।
> शाहजहाँ के शासनकाल में सरकार एवं परगना के मध्य चकला नाम की एक नई इकाई की स्थापना की गयी थी।

> भूमिकर के विभाजन के आधार पर मुगल साम्राज्य की समस्त भूमि 3 वर्गों में विभाजित थी-

1. खलसा भूमि : प्रत्यक्ष रूप से बादशाह के नियंत्रण में।
2. जागीर भूमि : तनख्वाह के बदले दी जाने वाली भूमि।
3. सयूरगल या मदद-ए-माश : अनुदान में दी गई लगानहीन भूमि। इसे मिल्क भी कहा जाता था।

> शेरशाह द्वारा भूराजस्व हेतु अपनायी जानेवाली पद्धति राई का उपयोग अकबर ने भी किया था।
> अकबर के द्वारा करोड़ी नामक अधिकारी की नियुक्ति 1573 ई० में की गयी थी। इसे अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था।
> 1580 ई० में अकबर ने दहसाला नाम की नवीन कर प्रणाली प्रारंभ की इस व्यवस्था को 'टोडरमल बन्दोबस्त' भी कहा जाता है।

इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि को चार भागों में विभाजित किया गया :-

1. पोलज : इसमें नियमित रूप से खेती होती थी। (वर्ष में दो बार फसल)
2. परती : इस भूमि पर एक या दो वर्ष के अन्तराल पर खेती की जाती थी।
3. चाचर : इस पर तीन से चार वर्ष के अन्तराल पर खेती की जाती थी।
4. बंजर यह खेती योग्य भूमि नहीं थी, इस पर लगान नहीं वसुला जाता था।

> 1570-71 ई० में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की नवीन प्रणाली जब्ती प्रारंभ की । इसमें कर निर्धारण की दो श्रेणी थी, एक को तखशीस एवं दूसरे को तहसील कहते थे।
> औरंगजेब ने अपने शासनकाल में नस्क प्रणाली को अपनाया और भू-राजस्व का राशि के उपज का आधा कर दिया।

> मुगल काल में कृषक तीन वर्गों में विभाजित थे-

1. खुदकाश्त : ये किसान उसी गाँव की भूमि पर खेती करते थे, जहाँ के वे निवासी थे।
2. पाही काश्त : ये दूसरे गाँव जाकर कृषि कार्य करते थे ।
3. मुजारियन : खुदकाश्त कृषकों से भूमि किराए पर लेकर कृषि कार्य करते थे ।

> मुगल काल में रुपए की सर्वाधिक ढलाई औरंगजेब के समय में हुई।
> आना सिक्के का प्रचलन शाहजहाँ ने करवाया।
> जहाँगीर ने अपने समय में सिक्कों पर अपनी आकृति बनवायी, साथ ही उस पर अपना एवं नूरजहाँ का नाम अंकित करवाया ।
> सबसे बड़ा सिक्का शंसब सोना का था। स्वर्ण का सबसे प्रचलित सिक्का इलाही था।
> मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार चाँदी का रुपया था।
> दैनिक लेन-देन के लिए ताँबे के दाम का प्रयोग होता था । एक रुपया में 40 दाम होते थे।

> मुगल सेना चार भागों में विभक्त थी-
(i) पैदल सेना, (ii) घुड़सवार सेना, (iii) तोपखाना और (iv) हाथी सेना।

> मुगलकालीन सैन्य व्यवस्था पूर्णतः मनसबदारी प्रथा पर आधारित थी। इसे अकबर ने प्रारंभ किया था।
> 10 से 500 तक मनसब प्राप्त करनेवाले मनसबदार, 500 से 2500 तक मनसब प्राप्त करने वाले उमरा एवं 2500 से ऊपर तक मनसब प्राप्त करनेवाले अमीर-ए-आजम। कहलाते थे।
> जात से व्यक्ति के वेतन एवं प्रतिष्ठा का ज्ञान होता था, सवार पद से घुड़सवार दस्तो की संख्या का ज्ञान होता था।
> जहाँगीर ने सवार पद में दो-अस्पा एवं सिह-अस्पा की व्यवस्था की । सर्वप्रथम यह पद महाबतखाँ को दिया गया।

मुगलकालीन लगान वसूल करने की व्यवस्थाएं

ग़ल्ला बख्शी इसमें फसल का कुछ भाग सरकार द्वारा ले लिया जाता था
नसक इसमें खड़ी फसल के आधार पर लगान का अनुमान लगाकर फसल कटने पर उसे ले लिया जाता था। यह व्यवस्था बंगाल में थी।
जब्ती इसमें बोई गई फसल के आधार पर लगान का निश्चय किया जाता था, जो नकद लिया जाता था।

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Friday, 17 April 2020

भारत का इतिहास :- मुगल साम्राज्य

मुगल साम्राज्य

> मुगल वंश का संस्थापक बाबर था। बावर एवं उत्तरवर्त्ती मुगल शासक तुर्क एवं सुन्नी मुसलमान थे। बाबर ने मुगल वंश की स्थापना के साथ ही पद-पादशाही की स्थापना की, जिसके तहत शासक को बादशाह कहा जाता था।


बाबर 1526 - 1530 ईo)

> बाबर का जन्म 24 फरवरी, 1483 ई० में हुआ था।
> बाबर के पिता उमरशेख मिर्जा फरगाना नामक छोटे राज्य के शासक थे।
> बाबर फरगाना की गद्दी पर 8 जून, 1494 ई० में बैठा। बाबर ने 1507 ई० में बादशाह की उपाधि धारण की, जिसे अब तक किसी तैमूर शासक ने धारण नहीं की थी।
> बाबर के चार पुत्र थे-हुमायूँ, कामरान, असकरी तथा हिंदाल।
> बाबर ने भारत पर पाँच बार आक्रमण किया।
> बाबर का भारत के विरुद्ध किया गया प्रथम अभियान 1519 ई० में युसूफ जाई जाति के विरुद्ध था। इस अभियान में बाबर ने बाजौर और भेरा को अपने अधिकार में कर लिया।
> बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निरमंत्रण पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी एवं मेवाड़ के शासक राणा साँगा ने दिया था।
> पानीपत के प्रथम युद्ध में वाबर ने पहली बार तुगलमा युद्ध नीति एवं तोपखाने का प्रयोग किया था। उस्ताद अली एवं मुस्तफा बाबर के दो प्रसिद्ध निशानेवाज थे, जिसने पानीपत के प्रथम युद्ध में भाग लिया था।

बाबर द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध

युद्ध वर्ष पक्ष परिणाम
पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल, 1526 ई० इब्राहिम लोदी एवं बाबर बाबर विजयी
खानवा का युद्ध 17 मार्च, 1527 ई० राणा साँगा एवं बाबर बाबर विजयी
चन्देरी का युद्ध 29 जनवरी, 1528 ई० मेदनी राय एवं बाबर बाबर विजयी
घाघरा का युद्ध 6 मई, 1529 ई० अफगानों एवं बाबर बाबर विजयी

> खानवा युद्ध में विजय के बाद बाबर ने 'गाजी' की उपाधि धारण की थी।
> बाबर को अपनी उदारता के लिए कलन्दर की उपाधि दी गयी।
> 30 जनवरी, 1528 को जहर दे देने के कारण राणा साँगा की मृत्यु हो गई।
> करीब 48 वर्ष की आयु में 26 दिसम्बर, 1530 ई० को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गयी।
> प्रारंभ में बाबर के शव को आगरा के आरामबाग में दफनाया गया, बाद में काबुल में उसके द्वारा चुने गए स्थान पर दफनाया गया।
> बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा की रचना की, जिसका अनुवाद बाद में फारसी भाषा में अब्दुल रहीम खानखाना ने किया ।
> बाबर को मुबईयान नामक पद्यशैली का भी जन्मदाता माना जाता है।
> बाबर प्रसिद्ध नक्शबन्दी सूफी ख्वाजा उबैदुल्ला अहरार का अनुयायी था ।
> बाबर का उत्तराधिकारी हुमायूँ हुआ।

हमायूँ (1530 - 1556 ई०)

> नसीरुद्दीन हुमायूँ, 29 दिसम्बर, 1530 ई० को आगरा में 23वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर वैठा। गद्दी पर वैठने से पहले हुमायूँ बदख्शां का सूबेदार था ।
> अपने पिता के निर्देश के अनुसार हुमायूँ ने अपने राज्य का बैटवारा अपने भाइयों में कर दिया। इसने कामरान को काबुल और कंधार, मिर्जा असकरी को सँभल, मिज्जा हिंदाल को अलवर एवं मेवाड़ की जागीरें दीं। अपने च्चेरे भाई सुलेमान मिर्जा को हमायूँ ने बदख्शाँ प्रदेश दिया।
> 1533 ई० में हुमायूँ ने दीनपनाह नामक नए नगर की स्थापना की थी।
> चौसा का युद्ध 25 जून, 1539 ई० में शेर खाँ एवं हमायूँ के बीच हुआ इस युद्ध में शेर खाँ विजयी रहा। इसी युद्ध के बाद शेर खाँ ने शेरशाह की पद्वी ग्रहण कर ली
> बिलग्राम या कन्नौज युद्ध 17 मई, 1540 ई० में शेर खाँ एवं हुमायूँ के बीच हुआ इस युद्ध में
भी हुमायूँ पराजित हुआ। शेर खाँ ने आसानी से आगरा एवं दिल्ली पर कव्जा कर लिया।
> बिलग्राम युद्ध के बाद हुमायूँ सिन्ध चला गया, जहाँ उसने 15 वर्षों तक घुमक्कड़ों जैसा निर्वासित जीवन व्यतीत किया।
> निर्वासन के समय हुमायूँ ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरु फारसवासी शिया मीर बाबा दोस्त उर्फ मीर अली अकबर जामी की पूत्री हमीदा बानू बेगम से 29 अगस्त, 1541 ई० को निकाह कर लिया। कालान्तर में हमीदा से ही अकबर जैसे महान सम्राट् का जन्म हुआ।
> 1555 में हुमायूँ ने पंजाब के शूरी शासक सिकन्दर को पराजित कर पुनः दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
> हुमायूँ द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युद्धों का क्रम है : देवरा (1531 ई०), चौसा (1539), बिलग्राम(1540) एवं सरहिन्द का युद्ध (1555 ई०)
> 1 जनवरी, 1556 ई० को दीन पनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूँ की मृत्यु हो गयी।
> हुमायूँनामा की रचना गुल-बदन बेगम ने की थी ।
> हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास करता था, इसलिए इसने सप्ताह के सातों दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाए।

शैरशाह (1540 - 1545 ई०)

> सूर साम्राज्य का संस्थापक अफगान वंशीय शेरशाह सूरी था।
> शरशाह का जन्म 1472 ई० में बजवाड़ा (होशियारपुर) में हुआ था।
> इजके बचपन का नाम फराद खो था। यह सुर वंश से संबंधित था।
> इनके पिता हसन खाँ जौनपुर राज्य के अन्तर्गत सासाराम के जमींदार थे
> फरीद ने एक शेर को तलवार के एक ही वार से मार दिया था। उसकी इस बहादूरी से प्रसन्न होकर विहार के अफगान शासक सुल्तान मुहम्मद बहार खाँ लोहानी ने उसे शेर खाँ
की उपाधि प्रदान की।
>|शेरशाह विलग्राम युद्ध (1540 ई०) के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
> शेरशाह की मृत्यु कालिंजर के किले को जीतने के क्रम में 22 मई, 1545 ई० को हो गयी। मृत्यु के समय वह उक्का नाम का आग्नेयास्त्र चला रहा था।
> कारलिंजर का शासक कीरत सिंह था।
> शोरशाह का मकबरा सासाराम में झील के बीच ऊँचे टीले पर निर्मित किया गया है।
> रोहतासगढ़ किला, किला-ए कुहना (दिल्ली) नामक मस्जिद का निर्माण शेरशाह के द्वारा किया गया था ।
> शेरशाह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र इस्लाम शाह था।
> शेरशाह ने भूमि की माप के लिए 32 अंकवाला सिकन्दरी गज एवं सन की डंडी का प्रयोग किया।
> शरशाह ने 178 ग्रेन चाँदी का रुपया एवं 380 ग्रेन ताँबे के दाम चलवाया।
> शेरशाह ने रोहतासगढ़ के दुर्ग एवं कन्नीज के स्थान पर शेरसूर नामक नगर बसाया।
> शेरशाह के समय पैदावार का लगभग 1/3 भाग सरकार लगान के रूप में वसूल करती थी।
> कबूलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरुआत शेरशाह ने की ।
> शेरशाह ने 1541 ई० में पाटलिपुत्र को पटना के नाम से पुनः स्थापित किया।
> शेरशाह ने ग्रैंड ट्रक रोड की मरम्मत करवायी ।
> मलिक मुहम्मद जायसी शेरशाह के समकालीन थे ।
> डॉक-[प्रथा का प्रचलन शेरशाह के द्वारा किया गया

अकबर (1542 -1605 ई०)

> सम्राट् अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई० को हमीदा बानू बेगम के गर्भ से अमरकोट के राणा वीर साल के महल में हुआ।
> अक्रवर का राज्याभिषेक 14 फरवरी, 1556 ई० को पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर हुआ।
> अकबर का शिक्षक अब्दुल लतीफ ईरानी विद्वान था।
> वह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर वादशाही गाजी की उपाधि से राजसिंहासन पर बैठा।
> बैरम खाँ 1556 से 1560 ई० तक अकबर का संरक्षक रहा।

अकबर द्वारा जीते गए प्रदेश

प्रदेश शासक वर्ष मुगल सेनापति
मालवा बाज बहादुर 1561 आदम खाँ, पीरमुहम्मद
चुनार अफ़गानों का शासन 1562 अब्दुल खाँ
गोंडवाना वीर नारायण एवं दुर्गावती 1564 आसफ खाँ स्वयं अधीनता
आमेर भारमल 1562 स्वीकार किया
मेड़ता जयमल 1562 सरफुद्दीन
मेवाड़ उदय सिंह एवं 1568 स्वयं अकबर
राणा प्रताप 1576 मानसिंह एवं आसफ खाँ
रणथम्भौर सूरजनहाडा 1569 भगवान दास एवं अकबर
कालिंजर रामचंद्र 1569 मजनू काकशाह
मारबाड़ राव चंद्रसेन 1570 स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी
जैसलमेर रावल हरि राय 1570 स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी
बीकानेर कल्याणमल 1570 स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी 
गुजरात मुजफ्फर खाँ 3 1571 खाने आजम सम्राट अकबर
बिहार एवं बंग दाऊद खाँ 1574-76 मुनीम  खाँ  खानखाना
काबुल हकीम मिर्जा 1581 मानसिक एवं अकबर
कश्मीर युसूफ याकूब खाँ 1586 भगवान दास एवं कासिम खाँ
उड़ीसा निसार खाँ  1592 मानसिंह
सिन्ध जानिबेग 1593 अब्दुर्ररहीम  खानखाना
बलूचिस्तान पन्नी अफगान 1595 मीर मासूम
कन्धार मुजफ्फर हुसैन 1595 शाहबेग

दक्षिण भारत

खानदेशअली खाँ1591स्वेच्छा से अधीनता स्वीकारी
दौलताबादचाँद बीबी1599मुराद, अब्दुर्रहीम खानखाना अब्दुल फजल अकबर
अहमदनगरबहादुर शाह चांदबीबी1600
असीरगढ़मीरन बहादुर1601अकबर (यह अकबर का अंतिम अभियान था)

> पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवम्बर, 1556 ई० को अकबर और हेमू के बीच हुई थी।
> मक्का की तीर्थ-यात्रा के दौरान पाटन नामक स्थान पर मुबारक खाँ नामक युवक ने बैरम खाँ की हत्या कर दी
> मई, 1562 ई० में अकबर ने 'हरम-दल' से अपने को पूर्णतः मुक्त कर लिया।
> हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून, 1576 ई० को मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप एवं अकबर के बीच हुआ। इस युद्ध में अकबर विजयी हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मान सिंह एवं आसफ खाँ ने किया था।
> अकबर का सेनापति मान सिंह था।
> महाराणा प्रताप की मृत्यु 57 वर्ष की उम्र में 19 जनवरी, 1597 ई० में हो गयी।
> गुजरात-विजय के दौरान अकबस सर्वप्रथम पुत्त्तगालियों से मिला और यहीं उसने सर्वप्रथम समुद्र को देखा।
> दीन-ए-इलाही धर्म का प्रधान पुरोहित अकबर था।
> दीन-ए-इलाही धर्म स्वीकार करने वाला प्रथम एवं अन्तिम हिन्दू शासक बीरबल था।
> अकबर ने जैनधर्म के जैनाचार्य हरिविजय सूरि को जगतगुरु की उपाधि प्रदान की थी।
> राजस्व प्राप्ति की जब्ती प्रणाली अकबर के शासनकाल में प्रचलित थी।
> अकबर के दीवान राजा टोडरमल ने 1580 ई० में दहसाल बन्दोबस्त व्यवस्था लागू की।
> अकबर के दरबार का प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन था।
> अकवर के दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार अव्दुससमद था।
> दसवंत एव बसावन अकबर के दरबार के चित्रकार थे।
> अकबर के शासनकाल के प्रमुख मायक तानसेन, बाजबहादुस्, बाबा रामदास एवं बैंजू बाबरे थे।
> अकबर की शासन-प्रणाली की प्रमुख विशेषता जमनसबदारी प्रथा थी।
>  अकबर के समकालीन प्रसिद्ध सूफी सन्त शेख सलीम ए चिश्ती थे।
> अकबर की मृत्यु 16 अक्टूबर, 1605 ई० को हुई। इसे आगरा के निकट सिकन्दरा में दफनाया गया।
> स्थापत्यकला के क्षेत्र में अकबर की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं-दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा, आगरा का लालकिला, फतेहपुर सिकरी में शाहीमहल, दीवाने खास, पंचमहल, बुलद दरवाजा, जोधाबाई का महल, इबादत खाना, इलाहाबादं का किला और लाहौर का किला।

अकबर के कुछ महत्वपूर्ण कार्य :

कार्य वर्ष
दासप्रथा का अंत 1562
अकबर को हर्मदल से मुक्ति 1562
तीर्थयात्रा कर समाप्त 1563
जजिया-कर समाप्त 1564
फतेहपुरसीकरी की स्थापना एवम् राजधानी की आगरा से 
फतेपुर सीकरी स्थानांतरण  5171
इबादतखाने की स्थापना 1575
इबादतखाने में सभी धर्मों के लोगों के प्रवेश की अनुमति 1578
मज़हर की घोषणा 1579
दीं-ए-इलाही की स्थापना 1582
इलाही संवत की शुरुआत 1583
राजधानी लाहोर स्थानांतरित 1585

अरकवर के दरवार को सुशोभित करने वाले नौ रत्न इस प्रकार थे-

(i) बीरबल, (ii) अबुलफजल) टोडरमल, (iv) भगवान दास, (v) तानसेन, (vi) मानसिंह, (vii ) अब्दुर्रहीम खानखाना, (vii) मुल्ला दो प्याजा,  (ix) हकीम हुकाम।

> अबुल-फजल का बड़ा भाई फैजी अकबर के दरबार में राजकवि के पद पर आसीन था।
> अबुल-फजल ने अकबरनामा ग्रंथ की रचना की । वह दीन-ए-इलाही धर्म का मुख्य पुरोहित था ।
> बीरबल के बचपन का नाम महेश दास था।
> संगीत सम्राट् तानसेन का जन्म ग्वालियर में हुआ था। इनकी प्रमुख कृतियाँ थीं-मियाँ की टोड़ी, मियाँ का मल्हार, मियाँ का सारंग आदि ।
> कण्ठाभरण वाणीविलास की उपाधि अकबर ने तानसेन को दी थी।
> अकबर ने भगवान दास (आमेर के राजा भारमल के पुत्र) को अमीर-ऊल-ऊमरा की उपाधि दी।
> युसफजाइयों के विद्रोह को दबाने कं दौरान बीरबल की हत्या  हो गई
> 1602 ई० में सलीम (जहाँगीर) के निर्देश पर दक्षिण से आगरा की और आ रहे  अबुल फजल को रास्ते में वीर सिंह बुंदेला नाम सरदार ने हत्या कर दी
> मुगल सम्राट् अकबर ने 'अनुवाद विभाग' की स्थापना की। नकीब खाँ, अब्दुल कादिर बदायूंनी तथा शेख सुल्तान ने रामायण एवं महाभारत का फारसी अनुवाद किया व महाभारत का नाम 'रज्मनामा' (युद्धों की पुस्तक) रखा।
> पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद अबुल फजल ने अनवर-ए-सादात नाम से तथा मौलाना हुसैन फैज ने यार-ए-दानिश नाम से किया। हाजी इब्राहिम सरहदी ने अथर्ववेद का, मुल्लाशाह मोहम्मद ने राजतरंगिणी का, अब्दुर्रहीम खानखाना ने 'तुजुक-ए-बाबरी' का तथा फैजी ने लीलावती का फारसी में अनुवाद किया। फैजी ने नल दमयन्ती (सूरदास द्वारा रचित) कथा का फारसी में अनुवाद कर उसका नाम 'सहेली' रखा।
> अकबर के काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है।
> अकबर ने बीरबल को कविप्रिय एवं नरहरि को महापात्र की उपाधि प्रदान की।
> बुलन्द दरवाजा का निर्माण अकबर ने गुजरात-विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
> चार बाग बनाने की परंपरा अकबर के समय शुरु हुई।
> अकबर ने शीरी कलम की उपाधि अब्दुसंसमद को एवं जड़ी कलम की उपाधि मुहम्मद हुसैन कश्मीरी को दिया।

नोट: मुगलों की राजकीय भाषा फारसी थी

जहांगीर (1605-1627) ईo

> अकबर का उत्तराधिकारी सलीम हुआ, जो 24 अक्टूबर, 1605 ई० को नूरुद्दीन मुठ्ठमद जहाँगीर बादशाही गाजी की उपाधि धारण कर गद्दी पर वैठा।
> जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त, 1569 ई० में हुआ था।
> अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम सफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर रखा ।
> जहांगीर को न्याय की जंजीर के लिए याद किया जाता है। यह जंजीर सोने की बनी थी जो आगरे  के किले के शाहबुर्ज एवं यमुना तट पर स्थित पत्थर के खम्भे में लगवाइ हुई थी।
> जहांगीर द्वारा शुरू की गई 'तुजुके-ए-जहाँगीरी नामक आत्मकथा को पूरा करने का श्रैय मौतिबिंद खां को है।
> जहाँगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने 1606 ई० में अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खुसरों और जहाँगीर की सेना के बीच युद्ध जालंधर के निकट भैरावल नामक मदान में हुआ। खुसरो को पकड़कर कैद में डाल दिया गया।
> खुसरो की सहायता देने के कारण जहाँगीर ने सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुनदेव को फांसी दिलवा दी। खुसरो गुरु से गोइंदवाल में मिला था।
> अहमदनगर के वजीर मलिक अम्बर के विरुद्ध सफलता से खुश होकर जहाँगीर ने खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की।
> 1622 ई० में कंधार मुगलों के हाथ से निकल गया। शाह अब्बास ने इस पर अधिकार कर लिया।

> नूरजहाँ : ईरान निवासी मिर्जा गयास बेग की पुत्री नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहरुन्निसा था। 1594 ई० में नूरजहाँ का विवाह अलीकुली बेग से सम्पन्न हुआ। जहाँगीर ने एक शेर मारने के कारण अली कुली वेग को शेर अफगान की उपाधि प्रदान की। 1607 ई० में शेर अफगान की मृत्यु के बाद मेहरून्निसा अकबर की विधवा सलीमा बेगम की सेवा में नियुक्त हुई। सर्वप्रथम जहाँगीर ने नवरोज त्योहार के अवसर पर मेहरुन्निसा को देखा और उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर जहाँगीर ने मई, 1611 में उससे विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात् जहाँगीर ने उसे नूरमहल एवं नूरजहाँ की उपाधि प्रदान की। नूरजहाँ के सम्मान में जहाँगीर ने चाँदी के सिक्के जारी किए।

> जहाँगीर ने गियास बेग को शाही दीवान बनाया एवं इतमाद उद.दौला की उपाधि दी।
> लाडली बेगम शेर अफगान एवं मेहरुन्निसा की पुत्री थी, जिसकी शादी जहाँगीर के पुत्र शहरयार के साथ हुई थी।
> नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब से इत्र निकालने की विधि खोजी थी ।
> महावत खाँ ने झेलम नदी के तट पर 1626 ई० में जहाँगीर, नूरजहाँ एवं उसके भाई आसफ खाँ को बन्दी बना लिया था।

> जहाँगीर के पाँच पुत्र थे-
(1) खुसरो, (2) परवेज, (3) खुर्रम, (4) शहरयार, (5) जहाँदार |।

> 28 अक्टूबर, 1627 ई० को भीमवार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु हो गयी उसे शहादरा (लाहौर) में रावी नदी के किनारे दफनाया गया।
> मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर जहाँगीर के शासनकाल में पहुँची।
> जहाँगीर के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे-आगा रजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, मनोहर एवं गोवर्धन, फारुख बेग, दौलत।
> जहाँगीर ने आगा रजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला की स्थापना की।

> उस्ताद मंसूर एवं अबुल हसन को जहाँगीर ने क्रमशः नादिर-अल-उस एवं नादिरुज्जमा की उपाधि प्रदान की।

> जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरन्त बता सकता हूँ कि यह किस चित्रकार की कृति है। यदि किसी चेहरे पर आँख किसी एक चित्रकार ने, भौंह किसी और ने बनाई हो, तो भी यह जान लेता हूँ कि आँख किसने और भौंह किसने बनायी है।
> जहाँगीर के समय को चित्रकलाू का स्वर्णकाल कहा जाता है।
> इतमाद उद-दौला का मकबरा 1626 ई० में नूरजहाँ बेगम ने बनवाया। मुगलकालीन वास्तुकला के अन्तर्गत निर्मित यह प्रथम ऐसी इमारत है, जो पूर्णरूप से बेदाग सफेद संगमरमर से निर्मित है। सर्वप्रथम इसी इमारत में त्रदूरा नामक जड़ाऊ काम किया गया
> अशोक के कौशाम्बी स्तम्भ (वर्तमान में प्रयाग) पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति तथा जहाँगीर का लेख उत्कीर्ण है ।
> जहाँगीर के मकबरा का निर्माण नूरजहाँ ने करवाया था।
> जहाँगीर के शासनकाल में कैप्टन हॉकिन्स, सर टॉमस रो, विलियम फिंच एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आए थे।

शाहजहाँ (1627 -1657 ई०)

> जहाँगीर के बाद सिंहासन पर शाहजहाँ बैठा।
> जोधपुर के शासक मोटा राजा उदय सिंह की पुत्री जगत गोसाई के गर्भ से 5 जनवरी, 1592 ई० को खुर्रम (शाहजहाँ) का जन्म लाहौर में हुआ था । 1612 ई० में खुर्रम का विवाह आसफ खाँ की पुत्री अरजुमन्द बानो बेगम से हुआ, जिसे शाहजहाँ ने मलिका-ए-जमानी की उपाधि प्रदान की। 7 जून, 1631 ई० में प्रसव पीड़ा के कारण उसकी मृत्यु हो गयी।
> 4 फरवरी, 1628 ई० को शाहजहाँ आगरे में अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि प्राप्तकर सिंहासन पर बैठा।
> शाहजहाँ ने आसफ खाँ को वर्जीर पद एवं महावत खाँ को खान खाना की उपाधि प्रदान की।
> इसने नूरजहाँ को दो लाख रु० प्रतिवर्ष की पेंशन देकर लाहौर जाने दिया, जहाँ 1645 ई० में उसकी मृत्यु हो गयी।
> अपनी बेगम मुमताज महल की याद में शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण आगरे में उसकी कब्र के ऊपर करवाया ।
> ताजमहल का निर्माण करनेवाला मुख्य स्थापत्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी था ।
> मयूर सिंहासन का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। इसका मुख्य कलाकार वे बादल खाँ था।
> शाहजहाँ के शासनकाल को स्थापत्यकला का स्वर्णयूग कहा जाता है। शाहजहाँ द्वारा बनूवायी गयी प्रमुख इमारतें हैं-दिल्ली का लालकिला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्ली जामा मस्जिद, आगरा मोती मस्जिद, ताजमहल आदि।
> शाहजहाँ ने 1638 ई० में अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली लाने के लिए वमुना नदी के दाहिने तट पर शाहजहाँनाबाद की नींव डाळी।
> आगरे के जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ की पूत्री जहाँआरा ने करवाई
> शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख चित्रकार मुहम्मद फकीर एवं मीर हासिम थे।
> शाहजहाँ ने संगीतज्ञ लाल खाँ को 'गुण समन्दर' की उपाधि दी थी
> शाहजहाँ के पुत्रों में दाराशिकोह सर्वाधिक विद्वान था । इसने भगवद्गीता योगवशिष्ट, उपनिषद एवं रामायण का अनुवाद फारसी में करवाया । इसने सर्र-ए-अकबर (महान रहस्य) नाम से उपनिषदों का अनुवाद करवाया था। दारा शिकोह कादिरी सिलसिले के मूल्ला शाह बदख्सी का शिष्य था।
> शहजहाँ ने दिल्ली में एक कॉलेज का निर्माण एवं दारुल  बका नामक कॉलेज की मरम्मत करायी।
> सितम्बर, 1657 ई० में शाहजहाँ के गंभीर म्हूप से बीमार पड़ने और मृत्यु का अफवाह फैलने के कारण उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध प्रारंभ हुआ। उस समय शूजा बंगाल, मुराद गुजरात एवं औरंगजेब दक्कन में था।
> 15 अप्रैल, 1658ई० में दारा एवं औरंगजेब के ब्रीच धरमट का युद्ध हुआ। इस युद्ध में दारा की पराजय हुई।
> सामूगढ़ का युद्ध 29 मई, 1658 ई को दारा एवं औरंगजेब के बीच हुआ। इस युद्ध में भी दारा की हार हुई। उत्तराधिकार का अन्तिम युद्ध देवराई की घाटी में मार्च, 1659 ई० का हुआ। इस युद्ध में दारा के पराजित होने पर उसे इस्लाम धर्म की अवहेलना करने के अपराध में 30 अगस्त, 1659 ई० को हत्या कर दी गई।
> शाह बुलद इकबाल (king of Lofty fortune) के रूप में दारा शिकोह जाना जाता है।
> ৪ जून, 1658 ई० को औरंगजेब ने शाहजहाँ को बंदी बना लिया। आगरे के किले में अपने कैदी जीवन के आठवें वर्ष अर्थात 22 जनवरी, 1666 ई० को 74 वर्ष की अवस्था में शाहजहाँ की मृत्यु हो गयी।

औरंगजेब (1658 - 1707 ई०)

> औरंगजेब का जन्म 24 अक्टूबर, 1618 ई० को दोहाद (गुजरात) नामक स्थान पर हुआ था
> औरंगजेब के बचपन का अधिकांश समय नरजहाँ के पास बीता। 18 मई, 1637 इ० की फारस के राजघराने की 'दिलरास बानो बेगम' के साथ औरंगजेब का निकाह हुआ ।
> आगरा पर कब्जा कर जल्दबाजी में औरंगजेब ने अपना राज्याभिषेक 'अबुल मुजफ्फर मुहउद्दीन मुजफ्फर औरंगजेब वहादुर आलमगीर' की उपाधि से 31 जुलाई, 1658 को करवाया। देवराई के युद्ध में सफल होने के बाद 15 मरई, 1659 को औरंगजेब ने दिल्ली में प्रवेश किया और शाहजहाँ के शानदार महल में 5 जून. 1659 को दूसरी बार राज्याभिषेक करवाया ।
> औरंगजेब के गुरु थे-मीर मुहम्मद हकीम ।
> औरंगजेब सुन्नी धर्म को मानता था, उसे जिन्दा पीर कहा जाता था ।
> जय सिंह एवं शिवाजी के बीच पुरन्दर की संधि 22 जून, 1665 ई० को सम्पन्न हुई।
> मई, 1666 ई० को आगरे के किले के दीवाने आम में औरंगजेब के समक्ष शिवाजी उपस्थित हुए। यहाँ शिवाजी को कैद कर जयपुर भवन में रखा गया।
> इस्लाम नहीं स्वीकार करने के कारण सिक्खों के 9वें गुरु तेगबहादुर की हत्या औरंगजेब ने 1675 में दिल्ली में करवा दी थी।
> औरंगजेब ने 1679 ई० में जाजिया-कर को पुनः लागू किया।
> औरंगजेब ने बीबी का मकबरा का निर्माण 1679 ई० में औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में करवाया।
> 1686 ई० में बीजाफुर एवं 1697 में गोलकुण्डा को औरंगजेब ने मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
> मदन्ना एवं अकन्ना नामक ब्राह्मणों का संबंध गोलकुण्डा के शासक अबुल हसन से था ।
> औरंगजेब के समय हुए जाट विद्रोह का नेतृत्व गोकुला एवं राजाराम ने किया था । 1670 ई० में तिलपत की लड़ाई में जाट परास्त हुए। गोकुल को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बावजूद जाटों ने 1685 ई० में

राजाराम के नेतृत्व में पुनः विद्रोह किया। इन जाटों ने सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे को भी लूटा । भरतपुर राजवंश की नींव औरंगजेब के शासनकाल में जाट नेता एवं राजाराम के भतीजा चूरामन ने डाली ।

> औरंगजेब के समय में हिन्दू मनसबदारों की संख्या लगभग 337 थी, जो अन्य मुगल सम्राटों की तुलना में अधिक थी।
> औरंगजेब का पुत्र अकबर ने दुर्गादास के बहकावे में आकर अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया।
> औरंगजेब ने कुरान को अपने शासन का आधार बनाया। इसने सिक्के पर कलमा खुदवाना, नवरोज का त्योहार मनाना, भाँग की खेती करना, गाना-बजाना, झरोखा दर्शन, तुलादान प्रथा (इस प्रथा में सम्राट को उसके जन्म दिन पर सोने, चाँदी तथा अन्य वस्तुओं से तौलने की प्रथा थी। यह अकबर के जमाने में प्रारंभ हुई थी।) आदि पर प्रतिबंध लगा दिया।
> औरंगजेब ने दरबार में संगीत पर पाबन्दी लगा दी तथा सरकारी संगीतज्ञों को अवकाश दे दिया गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत पर फारसी में सबसे अधिक पुस्तकें औरंगजेब के ही शासनकाल में लिखी गई औरंगजेव स्वयं वीणा बजाने में दक्ष था।
> औरंगजेब ने 1665 ई० में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया। इसके शासनकाल में तोड़े गए मंदिरों में सोमनाथ का मंदिर, बनारस का विश्वनाथ मंदिर एवं वीर सिंह देव द्वारा जहाँगीर काल में मधुरा में निर्मित केशव राय मंदिर थे।
> औरंगजेब की मृत्यु 20 फरवरी, 1707 ई० को हुई। इसे खुलदाबाद (Khuldabad) जो अब रोजा (Roza) कहलाता है में दफनाया गया। औरंगजेब के समय सूबों की संख्या 20 थी।
> औरंगजेब दारुल हर्ब (काफिरों का देश) को दारुल इस्लाम (इस्लाम का देश) में परिवर्तित करने को अपना महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानता था ।

नोट : औरगजेब के शासन काल में मुगल सेना में सर्वाधिक हिन्दू सेनापति थे।

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जौनपुर

> जौनपुर की स्थापना फिरोजशाह तुगलक ने अपने भाई जौना खाँ की स्मृति में की थी।
> जोनपुर में स्वतंत्र शकी राजवंश की स्थापना मलिक सरवर (ख्वाजा जहान) ने की थी।
> ख्वाजा जहान को मलिक-उस-शक (पूर्व का स्वामी) की उपाधि 1394 ई० में फिरोजशाह तुगलक के पुत्र सुल्तान महमूद ने दी थी।
> जौनपुर के अन्य प्रमुख शासक थे : मुबारकशाह (1399-1482 ई०), शम्सुद्दीन इब्राहिमशाह (1402-1436 ई०), महमूद शाह (1436-51 ई०) और हुसैनशाह (1458-1500 ई०)।
> लगभग 75 वर्ष तक स्वतंत्र रहने के बाद जौनपुर पर बहलोल लोदी ने कब्जा कर लिया।
> शर्की शासन के अन्तर्गत, विशेषकर इब्राहिमशाह के समय में, जौनपुर में साहित्य एवं स्थापत्यकला के क्षेत्र में हुए विकास के कारण जौनपुर को भारत के सीराज के नाम से जाना गया।
> अटालादेवी की मस्जिद का निर्माण 1408 ई० में शर्की सुल्तान इब्राहिम शाह द्वारा किया गया था।
> अटाला देवी मस्जिद का निर्माण कन्नौज के राजा विजयचन्द्र द्वारा निर्मित अटाला देवी के मंदिर को तोड़कर किया गया था।
> जामी मस्जिद का निर्माण 1470 ई० में हसैनशाह शर्की के द्वारा किया गया था ।
> झँझरी मस्जिद 1430 ई० में इब्राहिम शर्की के द्वारा एवं लाल दरवाजा मस्जिद का निर्माण मुहम्मदशाह के द्वारा 1450 ई० में किया गया था।

कश्मीर :

> सूहादेव नामक एक हिन्दू ने 1301 ई० में कश्मीर में हिन्दू राज्य की स्थापना की थी।
> 1339-40 ई० में कश्मीर में शाहमीर के द्वारा प्रथम मुस्लिम वंश की स्थापना की गयी।
> कश्मीर का प्रथम मुस्लिम शासक शाहमीर था, जो शम्सुद्दीन शाह मीर के नाम से गद्दी पर बैठा।
> इसने अपनी राजधानी इन्द्रकोट में स्थापित की।
> अलाउद्दीन ने राजधानी इन्द्रकोट से हटाकर अलाउद्दीनपुर (श्रीनगर) में स्थापित की।
> हिन्दू मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ने के कारण सुल्तान सिकन्दर को बुरतशिकन कहा गया।
> 1420 ई० में जैन-ऊल-आबदीन सिंहासन पर बैठा। इसकी धार्मिक सहिष्णुता के कारण इसे 'कश्मीर का अकबर' कहा गया।
> जैन-ऊल-आवदीन फारसी, संस्कृत, कश्मीरी, तिब्बती आदि भाषाओं का ज्ञाता था । इसने महाभारत एवं राजतरंगिणी को फारसी में अनुवाद करवाया।
> 1588 ई० में अकबर ने कश्मीर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया ।

बंगाल :

> इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बंगाल को दिल्ली सल्तनत में मिलाया।
> गयासुद्दीन तुगलक ने बंगाल को तीन भागों में विभाजित किया- लखनीती (उत्तर बंगाल), सोनार गाँव (पूर्वी बंगाल) तथा सतगाँव (दक्षिण बंगाल)।
> 1345 ई० में हाजी इलियास बंगाल के विभाजन को समाप्त कर शम्सुद्दीन इलियास शाह के नाम से बंगाल का शासक बना।
> पांडुआ में अदीना मस्जिद का निर्माण 1364 ई० में सुल्तान सिकन्दर शाह ने करवाया था।
> बंगाल का शासक गयासुद्दीन आजमशाह (1389-1409 ई०) अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध था।
> अलाउद्दीन हुसैन शाह (1493-1518 ई०) ने राजधानी को पांडुआ से गौड़ स्थानान्तरित किया।
> महाप्रभु चैतन्य अलाउद्दीन के समकालीन थे। अलाउद्दीन ने सत्यपीर नामक आन्दोलन की शुरुआत की।
> मालाधर बसू ने अलाउद्दीन के शासनकाल में ही श्रीकृष्ण विजय की रचना कर गुणराजखान की उपाधि धारण की । इनके बेटे को सत्यराजखान की उपाधि दी गई ।
> नासिरुद्दीन नुसरत शाह ने गौड़ में बड़ासोना एवं कदम रसूल मस्जिद का निर्माण करवाया ।

मालवा :

> दिलावर खाँ ने 1401 ई० में माछवा को स्वतंत्र घोषित किया।
> दिलावर का पुत्र अलप खाँ, हशंगशाह की उपाधि धारण कर 1405 ई० में माळवा का शासक बना । इसने अपनी राजधानी को धारा से मांइ स्थानान्तरित किया।
> मालवा में खिलजी वंश की स्थापना महमूद शाह ने का
> गुजरात के शासक बहादुरशाह ने महमूद शाह-द्वितीय को युद्ध में परास्त कर उसकी हत्या कर दी और मालवा को गुजरात में मिला लिया।
> मांडू के किले का निर्माण हुशंगशाह ने करवाया था । इस किले में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है- दिल्ली दरवाजा।
> बाजबहादुर एवं रूपमती का महल का निर्माण सुल्तान नासिरुद्दीन शाह द्वारा करवाया गया था।
> हिंडोला भवन या दरबार हॉल का निर्माण हुशंगशाह के द्वारा करवाया गया था।
> जहाजमहल का निर्माण गयासुद्दीन खिलजी ने मांडू में करवाया था ।
> कुश्कमहल को महमूद खिलजी ने फतेहाबाद नामक स्थान पर बनवाया था। 

गुजरात :

> गुजरात के शासक राजाकर्ण को पराजित कर अलाउद्दीन ने 1297 ई० में इसे दिल्ली-सल्तनत में मिला लिया  था।
> 1391 ई० में मुहम्मदशाह तुगलक द्वारा नियुक्त गुजरात का सूबेदार जफर खाँ ने 'सुल्तान मुजफ्फरशाह' की उपाधि ग्रहण कर 1407 ई० में गुजरात का स्वतंत्र सुल्तान बना ।
> गुजरात के प्रमुख शासक थे : अहमदशाह (1411-52), महमूदशाह बेगड़ा (1458-1511 ई०) और बहादुर शाह (1526-1537 ई०)।
> अहमदशाह ने असावल के निकट साबरमती नदी के किनारे अहमदाबाद नामक नगर बसाया और पाटन से राजधानी हटाकर अहमदाबाद को राजधानी बनाया।
> गुजरात का सबसे प्रसिद्ध शासक महमूद बेगड़ा था
> महमूद बेगड़ा ने गिरनार के निकट मुस्तफाबाद नामक नगर और चम्मानेर के निकट मुहम्मदाबाद नगर बसाया।
> 1572 ई० में अकबर ने गुजरात को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

मेवाड :

अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ई० में मेवाड़ के गुहिलौत राजवंश के शासक रत्नसिंह को पराजित कर मेवाड़ को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
> गुहिलौत वंश की एक शाखा सिसोदिया वंश मेवाड़ को स्वतंत्र करा लिया।
> राणा कुम्भा ने 1448 ई० में चित्तौड़ में एक विजय स्तंभ की स्थापना की।
> खानवा का युद्ध 1527 ई० में राणा सौगा एवं बाबर के बीच हुआ, जिसमें बाबर विजयी हुआ।
> 1576 ई० में हल्दीघाटी का युद्ध राणा प्रताप एवं अकबर के बीच हुआ, जिसमें अकबर विजयी हुआ।
> मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ थी। जहाँगीर ने मेवाड़ को मुगल साम्राज्य में मिला लिया ।

खानदेश :

> तुगलक वंश के पतन के समय फिरोजशाह तुगलक के सूबेदार मलिक अहमद राजा फारुकी ने नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के बीच 1382 ई० में खान देश की स्थापना की।
> खान देश की राजधानी बुरहानपुर थी। इसका सैनिक मुख्यालय असीरगढ़ था ।
> 1601 ई० में अकबर ने खानदेश को मूगल साम्राज्य में मिला लिया।

सूफी आन्दोलन :

> जो लोग सूफी संतों से शिष्यता ग्रहण करते थे, उन्हें मुरीद कहा जाता था ।
> सूफी जिन आश्रमों में निवास करते थे, उन्हें खानकाह या मठ कहा जाता था।
> सूफियों के धर्मसंघ बा-शारा (इस्लामी सिद्धान्त के समर्थक) और वे शारा (इस्लामी सिद्धान्त से बैंधे नहीं) में विभाजित थे ।
> भारत में चिश्ती एवं सुहराबर्दी सिलसिले की जड़े काफी गहरी थीं। 1192 ई० में मुहम्मद गौरी के साथ ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भारत आए। इन्होंने यहाँ चिश्ती परम्परा की शुरुआत की । चिश्ती परम्परा का मुख्य केन्द्र अजमेर था।
> चिश्ती परम्परा के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण संत थे-निजामुद्दीन औलिया, बाबा फरीद, बख्तियार काकी एवं शेख बुरहानुद्दीन गरीब। बाबा फरीद बख्तियार काकी के शिष्य थे।
> बाबा फरीद की रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं।
> बाबा फरीद के दो महत्त्वपूर्ण शिष्य थे- निजामुद्दीन औलिया एवं अलाउद्दीन साबिर।
> हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने जीवनकाल में दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा था। इनके प्रमुख शिष्य थे-शेख सलीम चिश्ती, अमीर-खुसरो, अमीर हसन देहलवी।
> शेख बुरहानुद्दीन गरीब ने 1340 ई० में दक्षिण भारत के क्षेत्रों में चिश्ती सम्प्रदाय की शुरुआत की और दौलतावाद को मुख्य केन्द्र वनाया।
> सूफियों के सुहरावर्दी धर्मसंघ या सिलसिला की स्थापना शेख शिहाबुद्दीन उमर सुहरावर्दी ने की, किन्तु 1262 ई० में इसके सुदृढ़ संचालन का श्रेय शेख बदरुद्दीन जकारिया को है। इन्होंने सिंध एवं मुल्तान को मुख्य केन्द्र बनाया। सुहरावर्दी धर्मसंघ के अन्य प्रमुख संत थे-जलालुद्दीन तबरीजी, सैय्यद सुर्ख जोश, बुरहान आदि। सुहरावर्दी सिलसिला ने राज्य के संरक्षण को स्वीकार किया था।
> शेख अब्दुल्ला सत्तारी ने सत्तारी सिलसिले की स्थापना की थी। इसका मुख्य केन्द्र बिहार था।
> कादरी धर्मसंघ या सिलसिला की स्थापना सैय्यद अबुल कादिर अल जिलानी ने बगदाद में की थी। भारत में इस सिलसिला के प्रवर्त्तक मुहम्मद गौस थे इस सिलसिले के अनुयायी गाने-क्जाने के विरोधी थे । ये लोग शिया मत के विरुद्ध थे
> राजकुमार दारा (शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र) कादिरी सिलसिला के मुल्लाशाह का शिष्य था।
> नक्शबन्दी धर्मसंघ या सिलसिला की स्थापना ख्वाजा उबेदुल्ला ने की थी। भारत में इस सिलसिला की स्थापना ख्वाजा बकी बिल्लाह ने की थी। भारत में इसके व्यापक प्रचार का श्रेय बकी बिल्लाह के शिष्य अकबर के समकालीन 'शेख अहमद' सरहिन्दी को था ।
> फिरदौसी सुहरावर्दी सिलसिला की ही एक शाखा थी, जिसका कार्य क्षेत्र बिहार था । इस सिलसिले को शेख शरीफउद्दीन याह्या ने लोकप्रिय बनाया। याह्या ख्वाजा निजामुद्दीन के शिष्य थे।

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भारत का इतिहास :- भक्ति-आन्दोलन

भक्ति-आन्दोलन

> छठी शताब्दी ई० में भक्ति आन्दोलन का शुरुआत तमिल क्षेत्र से हुई जो कर्नाटक और महाराष्ट्र में फैल गई।
> भाक्ति आन्दोलन का विकास बारह अलवार वैष्णव संतों और तिरसठ नयनार शैव संतो ने किया।
> शेव संत अप्पार ने पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को शैवधर्म स्वीकार करवाया। भक्ति कवि-संतों को संत कहा जाता था। और उनके दो समूह थे। प्रथम समूह वैष्णव संत थे जो महाराष्ट्र में लोकप्रिय हुए। वे भगवान विठोबा के भक्त थे। विठोबा पंथ के संत और उनके अनुयायी वरकरी या तीर्थयात्री-पंथ कहलाते थे, क्योंकि हर वर्ष पंढरपुर की तीर्थयात्रा पर जाते थे। दुसरा समूह पंजाब एवं राजस्थान के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सक्रिय था और इसकी निर्गुण भक्ति (हर विशेषता से परे भमवान की भक्ति) में आस्था थी।
> भक्ति आन्दोलन को दक्षिण भारत से उत्तर भारत में 12वीं शताब्दी के प्रारंभ में रामानन्द के द्वारा लाया गया।
> बंगाल में कृष्ण भक्ति की प्रारंभिक प्रतिपादकों में विद्यापति ठाकुर और चंडीदास थे।
> रामानंद की शिक्षा से दो संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ, सगुण जो पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और निर्गुण जो भगवान के निराकर रूप को पूजता है।
> सगुण संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध व्याख्याताओं में ये, तुलसीदास और नाभादास जैसे राम भक्त और निम्बार्क, वर्लभाचार्य, चैतन्य, सूरदास और मीराबाई जैसे कृष्ण भक्त।
> निर्गुण सम्प्रदाय के सयसे प्रसिद्ध प्रतिनिधि थे कबीर, जिन्हें भावी उत्तर भारतीय पंथों का आध्यात्मिक गुरु माना गया है ।
> शंकराचार्य के अद्वैतदर्शन के विरोध में दक्षिण में वैष्णव संतों संतों द्वारा चार मतों की स्थापना की गयी थी


दक्षिण में वैष्णव वैष्णव संतों द्वारा स्थापित चार मत

श्री संप्रदाय रामनुजचार्य विशिष्टाद्वैतवाद
ब्रम्हा-सम्प्रदाय माध्वाचार्य द्वित्ववाद
रूद्र-सम्प्रदाय विष्णुस्वामी शुद्धद्वैतवाद
सनकादि सम्प्रदाय निम्बबार्काचार्य द्वैताद्वैतवाद

रामानुजाचार्य : (11वीं शताब्दी) इन्होंने राम को अपना आराध्य माना। इनका जन्म 1017 ई० में मदास के निकट पेरुम्बर नामक स्थान पर हुआ था। 1137 ई० में इनकी मृत्यु हो गयी। रामानुज ने वेदान्त में प्रशिक्षण अपने गुरु, कांचीपुरम के यादव प्रकाश से प्राप्त किया था ।

रामानंद : रामानंद का जन्म 1299 ई० में प्रयाग में हुआ था इनकी शिक्षा प्रयाग तथा वाराणसी में हुई। इन्होंने अपना सम्प्रदाय सभी जातियों के लिए खोल दिया। रामानुज की भाँति इन्होंने भी भक्ति को मौक्ष का एकमात्र साधन स्वीकार किया। इन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं सीता की आराधना को समाज के समक्ष रखा । इनके प्रमुख शिष्य थे-रैदास (हरिजन), कबीर (जुलाहा), धन्ना (जाट), सेना (नाई), पीपा (राजपूत) ।

कबीर : कबीर का जन्म 1425 ई० में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था| लोक लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तालाब के समीप छोड़ दिया। जुलाहा नीरु तथा उसकी पली नीमा इस नवजात शिशु को अपने घर ले आये। इस बालक का नाम कबीर रखा गया। इन्होंने राम, रहीम, हजरत, अल्लाह आदि को एक ही ईश्वर के अनेक रूप माने । इन्होंने जाति प्रथा, धार्मिक कर्मकांड, बाह्य आडंम्बर, मूर्तिपूजा, जप-तप, अवतारवाद आदि का घोर विरोध करते हुए एकेश्वरवाद में आस्था व्यक्त की एवं निराकार ब्रह्मकी उपासना को महत्त्व दिया। निर्गुण भक्ति धारा से जुड़े कबीर ऐसे प्रथम भक्त थे, जिन्होंने संत होने के बाद भी पूर्णतः गृहस्थ जीवन का निर्वाह किया। इनके अनुयायी 'कवीरपंथी' कहलाए। कबीर के उपदेश सबद सिक्खों के आदिग्रंथ में संगृहीत हैं।

गुरू नानक : गुरु नानक का जन्म 1469 ई० अविभाजित पंजाब के तलवण्डी नामक स्थान पर हुआ था, जो अब ननकाना साहिब के नाम से विख्यात है। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा पिता का नाम कालूराम था। बटाला के मूलराज खत्री की बेटी, सुलक्षणी से उनका विवाह हुआ। उन्होंने देश का पाँच बार चक्कर लगाया, जिसे उदासीस कहा जाता है । उन्होंने कीर्तनों के माध्यम से उपदेश दिए । अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में अपना डेहरा (मठ) स्थापित किया । अपने जीवन काल में ही उन्होंने आध्यात्मिक आधार पर अपने पुत्रों  की जगह, अपने शिष्य भाई लहना (अगंद) की अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।इनकी
मृत्य 1539 ई० में करतारपुर में हुई। नानक ने सिक्ख धर्म की स्थापना की। नानक सूफी संत बाबा फरीद से प्रभावित थे।

चैतन्य स्वामी : चैतन्य का जन्म 1486 ई० में नदिया (वंगाल) के मायापुर गाँव में हुआ था । इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र एवं माता का नाम शची देवी था। पाठशाला में चैतन्य को निमाई पंडित कहा जाता था। इन्होंने गोसाई संघ की स्थापना की और साथ ही संकीर्तन प्रथा को जन्म दिया। इनके दार्शनिक सिद्धान्त को अचिंत्य भेदाभेदवाद के नाम से जाना जाता है।संन्यासी बनने के बाद बंगाल छोड़कर पुरी (उड़ीसा) चले गये, जहाँ उन्होंने  दो दशक तक भगवान जगन्नाथ की उपासना की।

श्री मदूवल्लभाचार्य: श्री मद्वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई० में चम्पारण्य (वाराणसी) में हुआ था। इनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट तथा माता का नाम यल्लमगरु था। इनका विवाहमहालक्ष्मी के साथ हुआ। इनके दो पुत्र थे-गोपीनाथ (जन्म 1511 ई०) तथा विट्ठलनाथ (जन्म 1516 ई०) थे। इन्होंने गंगा यमुना संगम के समीप अरैल नामक स्थान पर अपना निवासस्थान बनाया। बल्लभाचार्य ने भक्ति -साधना पर विशेष जोर दिया। इन्होंने भक्ति को मोक्ष का साधन बताया। इनके भक्तिमार्ग को पुष्टिमार्ग कहते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास : इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में राजापुर गाँव में 1554 ई० में हुआ था। इन्होंने रामचरितमानस की रचना की।

धन्ना : धन्ना का जन्म 1415 ई० में एक जाट परिवार में हुआ था। राजपुताना से बनारस आकर ये रामचंद के शिष्य बन गए  कहा जाता है कि इन्होने भगवान कि मूर्ति को हठात भोजन कराया था

रैदास : ये जाति से चमार थे। ये रामानंद के बारह शिष्यों में एक थे। इनके पिता का नाम रघु तथा माता का नाम घुरबिनिया था। ये जूता बनाकर जीविकोपार्जन करते थे। मीराबाई ने  इन्हें अपना गुरु माना है। इन्होंने रायदासी सम्प्रदाय की स्थापना की।

दादू-दयाल : ये कवीर के अनुयायी थे। इनका जन्म 1554 ई० में अहमदाबाद में हुआ था। इनका संबंध धुनिया जाति से था। साँभर में आकर इन्होंने ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की। अकबर ने धार्मिक चर्चा के लिए इन्हें एक बार फतेहपुर सीकरी बुलाया था। इन्होंने 'निपख' नामक आन्दोलन की शुरुआत की।

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भारत का इतिहास :- बहमनी राज्य

बहमनी राज्य

> मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में 1347 ई० में हसनगंग ने बहमनी राज्य की स्थापना की। वह अलाउद्दीन हसन बहमन शाह के नाम से सिंहासन पर बैठा ।
> इसने अषनी राजधानी गुलबर्गा को वनाया। इसकी राजभाषा मराठी थी।
> इसने अपने साम्राज्य को चार प्रान्तों में गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार एवं वीदर में बॉँटा ।
> इसकी मृत्यु 11 फरवरी, 1358 ई० को हो गयी।
> अलाउद्दीन हसन के पश्चात उसका पुत्र मुहम्मदशाह प्रथम सुल्तान बना। इसके काल में ही सबसे पहले बारूद का प्रयोग अलाउद्दीन मुजाहिद शाह (बुक्का के विरूद्ध) हुआ।
> भीमा नदी के तट पर फिरोजाबाद की मुहम्मद शाह द्वितीय
स्थापना ताज-उद्दीन फिरोज ने की थी। फिरोज खगोलिकी को प्रोत्साहन देता था शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम और उसने दौलताबाद के पास एक वैधशाला बनवाई थी।


बहमनी वंश के प्रमुख शासक :-

मुहम्मद शाह प्रथम (1358-1375 ई०)
अलाउद्दीन मुजाहिद शाह (1375-1378 fo).
दाऊद प्रथम (1378 ई०)
मुहम्मद शाह द्वितीय (1378-1397 ई०)
ताज़-उद्दीन-फिरोज (1397--1422 ई०)
शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम (1422-1436 fo)
अलाउद्दीन अहमद -II (1436-1458 ई०)
सुल्तान शम्सुद्दीन मुहम्मद-II (1463-1482 ई०)

> शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम ने अपनी राजधानी गुलबर्गा से हटाकर बीदर में स्थापित की । इसने बीदर का नया नाम मुहम्मदाबाद रखा ।
> मुहम्मद-III के शासन-काल में 'ख्वाजा जहाँ' की उपाधि से महमूद गँवा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।
> महमूद गरवाँ ने बीदर में एक महाविद्यालय की स्थापना कराई। रियाजुल इन्शा नाम से महमूदगवाँ के पत्रों का संग्रह किया गया।
> 1417 ई० में रूसी यात्री निकितन बहमनी साम्राज्य की यात्रा पर आया। इस समय बहमनी राज्य पर ताज-उद्दीन-फिरोज का शासन था।
> बहमनी साम्राज्य के चारों प्रांतों (तरफों या अतरफों) के प्रांतपति (तरफदार) उसके विरुद विशेष से जाना जाते थे-
1. दौलताबाद का तरफ़दार : मसनद्-ए-आली
2. बरार का तरफ़दार : मरजलिस-ए-आली
4. गुलबर्गा का तरफ़दार : मालिक नायब
3. बीदर का तरफ़दार : अजाम-ए-हुमायूँ

> बीजापुर गुलबर्गा तराफ़ में शामिल था। यह सबसे महत्त्वपूर्ण तराफ़ था।
> कलीमउल्लाह बहमनी वंश का अंतिम शासक था। इसकी मृत्यु के समय बहमनी राज्य पाँच स्वतंत्र राज्यों में बँट गया ।

इन स्वतंत्र सज्यों से संबंधित विवरण इस प्रकार है-

राज्य वंश संस्थापक स्वापना वर्ष
1. बीजापुर आदिल शाही युसूफ आदिल शाह 1489 ईo
2. अहमदनगर निजामशाही मलिक अहमद 1490 ईo
3. बरार इमादशाही फतेहउल्लाह इमादशाह 1490 ईo
4. गोलकुण्डा कुतुबशाही कुलीक़ुतुबशाह 1512 ईo
5. बीदर बारिद्शाही अमीर अली बरिद 1526 ईo

> मुहम्मद प्रथम के मंत्री सैफुट्दीन गौरी ने केन्द्रीय शासन का कार्य कई विभागों में विभक्त किया और उसे आठ मंत्रियों को नियुक्त किया, जो इस प्रकार थे  -

1. वकील ए-सल्तनत : दिल्ली के मलिक नायब के समान ।
2. बजील-ए-कुल : सभी मंत्रियों के कार्यों का निरीक्षण (वरकील को छोड़कर) ।
3. अमीर-ए-जुमला : अर्थ विभाग का अध्यक्ष ।
4. वजीर-ए-अशरफ : विदेश नीति एवं दरबार संबंधी कार्यों का निष्मादन करता था।
5. नाजिर : वह अर्थ विभाग से संबंधित था ।
6. पेशवा : बकील-ए-सल्तनत का सहायक था।
7. कोतवाल : नगर का मुख्य पुलिस अधिकारी था ।
8. सद्रे-ए-जहाँ : न्याय विभाग, धर्म तथा दान विभाग का अध्यक्ष ।

> सुल्तान के महल तथा दरबार की सुरक्षा के लिए विशेष अंगरक्षक सैनिक दल था जिसे साख-ए-खेल कहा जाता था। यह चार भागों या नौबत में विभाजित थे, जिसके मुख्य अधिकारी सर-ए-नौबत होता था।
> बहमनी राज्य में कुल 18 शासक हुए, जिन्होंने कुल मिलाकर 175 वर्ष शासन किया।

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